हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २८] भाषाटीकासमेता। (३८९)
केन तु ॥२८॥ पिष्ट्वा वातपिटिकानां लेपनं मेहनस्य च ॥२९॥
यष्टीमधु तथा कुष्ठं चन्दनं रक्तचन्दनम्॥ उशीरं कत्तृणं चैव
रक्तधातुमृणालकम् ॥३०॥ क्षीरमण्डकसंयुक्तं यथालाभं भिष-
ग्वर ॥ लेपनं पित्तरक्तानां मेहदाहः प्रशाम्यति ॥ ३१॥ धावनं
शीतपयसा नवनीतेन मर्दनम् ॥ कणं कदम्बार्जुनपिण्याकप-
त्राणि दाडिमस्य च ॥ ३२ ॥ खदिरस्य दलानां तु तथा चाम-
लकीदलान् ॥ उष्णेन वारिणा पिष्ट्वा सोमपाके च मेहने ॥३३॥
त्रिफलायाश्च वा चूर्णं शुष्कपूयनिवारणम्॥ धावनं काञ्जिके-
नाथ तक्रेणाथ तुषाम्बुना ॥ ३४ ॥ अतिशीतेन तोयेन मेहपाके
च धावनम् ॥
अब प्रमेहकी पिड़िकाओंकी चिकित्साको कहते हैं,धव, अर्जुनवृक्ष, कदंब, वेर, खैर, सीसम,
नींव इनकी छालके काथसे प्रमेहरोगकी पिड़िकाओंको धोवे ॥ २६ ॥ अर्जुनवृक्ष, कदंब,
टेंटूवृक्षकी भीतरकी वकलके काथसे पकी हुई पिड़िकाओंकी राधको शोधनेके वास्ते धोवें
॥ २७ ॥ मंगरेका रस, तुलसीके पत्तोंका रस, मोठ, परवल इनके पत्ते कांजीसे ॥ २८ ॥
पीस वातसे उपजी हुई प्रमेहकी पिड़िकाओंपै लेप करे ॥ २९ ॥ मुलहटी, कूठ, चंदन, लाल
चंदन, खश, रोहिसतृण, गेरू,कमलकी नाली ॥ ३० ॥ दूधमें तथा चावलोंके मांडमें पीसके
लेप करनेसे शिश्नका दाह शांत होता है ॥ ३१ ॥ चावलोंके धोवनसे ठंढे पानीमें वा नोनी
घृतमें पीस और गेहूंके कणका रवा, कदंबवृक्ष, तिलोंका वृक्ष इनके पत्ते और अनार ॥ ३२ ॥
खैर, आंवला इनके पत्ते गरम जलमें पीस सोमपाक प्रमेहरोगमें देवे ॥ ३३ ॥ त्रिफलाका
चूर्ण शुष्कपूय प्रमेहका निवारण करता है अथवा कांजी, तक्र, शीतल जलसे इंद्रियका धोना हित
है ॥ ३४ ॥ और प्रमेहपाकमें अत्यंत ठंढे जलसे इंद्रियका धोना श्रेष्ठ है ॥
अथ प्रमेहमें पथ्यापथ्य ।
रक्तशालिश्च षष्टीकश्चाढकी वा कुलत्थकः ॥ ३५ ॥ घृतं च
मधुरं किञ्चिद्रोजनार्थे विधीयते ॥ क्षाराम्लकटुकं वापि दिवा
स्वप्नं विशेषतः ॥ ३६ ॥ स्त्रीदर्शनं व्यवायञ्च तथा चात्यशनं
तथा ॥ चलनं धावनं चेति तथा मूत्रविरोधनम् ॥ ३७ ॥
वस्त्रपातं रक्तवस्त्रं वर्जयेद्भिषजां वरः ॥ एकान्ते गृहमध्ये च