हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने ]
पित्तके क्षयरोगमें मंदाग्नि, अरुचि, जड़ता ये रोग होते हैं और खांसी, श्वास, थुकथुकी,
शोफ, मन्दचेष्टा ये उपद्रव होते हैं ॥ ११ ॥
अथ पित्तक्षयकी चिकित्सा ।
स्वेदाभ्यङ्गान्नपानानि दीपनानि प्रयोजयेत् ॥
जाङ्ग्लानि रसान्नानि सेवयेत्पित्तकृत्क्षये ॥ १२ ॥
स्वेद, मालिस, दीपन अर्थात् जठराग्निको दीप्त करनेवाले अन्नपान, इनको प्रयुक्त करे और
पित्तसे उपजे क्षयरोगमें जांगल देशके जीवोंके मांसका रस हित है ॥ १२ ॥
अथ कफक्षयका कारण ।
व्यायामे च व्यवाये च रूक्षान्नाहारसेवनैः ॥
सन्तापक्रोधनश्चैव जायते कफसम्भवः ॥ १३ ॥
कसरत करनेसे, मैथुन, रूखा अन्नका भोजन, क्रोध, इनके सेवनसे कफका
क्षयरोग बढता है ॥ १३ ॥
अथ कफक्षयका लक्षण ।
तन दाहोऽथवा पाण्डुः शोफो निःश्वसन भ्रमः ॥
विनिद्रता क्षुत्तृषा च स्त्रीसङ्गेनापि नन्दति ॥ १४ ॥
उससे दाह अथवा पांडुरोग, शोजा, श्वासरोग, भ्रम, निद्राका नाश, क्षुधा, स्त्रीसंगसे
प्रसन्नता ये लक्षण होते हैं ॥ १४ ॥
अथ कफक्षयकी चिकित्सा ।
तस्य शीतान्नपानानि कन्दशाकादिकै रसैः ॥
अनूपदधिदुग्धैर्वा सेवनं च समीहितम् ॥ १५ ॥
उसके शीतल अन्नपान, कंदशाकआदिकोंके रस, अनूपदेशके जीवोंका मांस, दही, दूध,
इनका सेवन हित है ॥ १५ ॥
अथ त्रिदोषजक्षयकी चिकित्सा ।
त्रिभिर्दोषैः क्षयं प्राप्तैस्तदा हि मरणं ध्रुवम् ॥
साधारणा क्रिया तस्य प्रयोक्तव्या महामते ॥ १६ ॥
जब त्रिदोषसे उपजा हुआ क्षयरोग होता है तब निश्चय मरण होजाता है । हे हारीत
महामते ! उसकी साधारण चिकित्सा कही है ॥ १६ ॥