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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 548 में से

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पृष्ठ 297

अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २६५ )

हैं ॥ ५ ॥ रोगसे आक्रांत होनेसे अथवा विषमशयन करनेमें अथवा मन्द ज्वरसे
यह क्षयरोग होजाता है और कफसे, पित्तसे अथवा वायुसे इन तीन प्रकारोंसे देहमें क्षय-
रोग होता है ॥
अथ क्षयरोगके प्रकार ।
रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रगतस्तथा ॥ एवं दशविधा
नॄणां क्षया देहे भवन्ति वै ॥६॥ पुनश्चैषां लक्षणानि सावधा-
नतया शृणु ॥ ७ ॥
और रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य इन सात धातुओंमें होता है, ऐसे
मनुष्यके शरीरमें दश प्रकारके क्षयरोग कहे हैं ॥ ६ ॥ अब फिर भी इनके लक्षणोंको
कहते हैं सुनो ॥ ७ ॥
अथ वातक्षयका निदान ।
अतिस्वेदातिघर्मेण चिन्ताशोषभयादिना ॥
वाताद्यः सेवितैश्चापि जायते मारुतक्षयः ॥ ८॥
अत्यंत पसीना, अति घाम, चिंता, शोष, भय इत्यादिकोंसे और वायुको करनेवाले पदा-
र्थोंके सेवनेसे वायुका क्षय होजाता है ॥ ८ ॥
अथ वातक्षयका लक्षण ।
तेन तन्द्राऽङ्गदाहश्च पिपासारुचिवपथुः ॥
तमः क्लमो भ्रमश्चैव भवेच्च मारुतक्षये ॥ ९ ॥
उससे तन्द्रा, अंगमें दाह, तृषा, अरुचि, कंपना, अंधेरी, ग्लानि, भ्रम ये उपद्रव वातके
क्षयरोगमें होते हैं ॥ ९ ॥
वातक्षयमें सेव्यपदार्थ ।
तस्मादानूपानि सेव्यानि रसानि पललानि च ॥
रसोनादिककल्कञ्च सेव्येद्वातनाशने ॥ १० ॥
इसलिये वातको नाश करनेवाले रस और अनूपदेशके मांसोंका सेवन करे और लहसुनआ-
दिक औषधोंके कल्कके सेवनेसे भी वातका नाश होता है ॥ १० ॥
अथ पित्तक्षयके हेतु ।
पित्तक्षयेऽग्निमान्द्यं च जायतेऽरुचिजाड्यता ॥
कासहृल्लासशोफश्च जायते मन्दचेष्टता ॥ ११ ॥