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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

( २२८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
ग्रहणीरोग, बवासीर, भगंदर, अरोचक, गुल्मरोग, प्रमेह, शूल, पथरी, कृमिरोग, पांडुरोग,
इनको हरती हैं ॥ ९६ ॥ श्रेष्ठ रसायन हैं, वलियोंको नाशती हैं, वीर्य और बलको देती
हैं, वर्ण और इंद्रियोंको प्रकाशित करती हैं, दुःखको नाशती हैं, और सबकालमें कुष्ठको और
भ्रमको नाशती हैं ॥ ९७ ॥
अथ अभयाद्यवलेह ।
हरीतकीपञ्चशतानि धीमान् द्रोणेन गोमूत्रशतेन पाच्यम् ॥ मृद्व-
ग्निना यावदशेषमेव मूत्रं विजीर्णे विधिवद्विहिज्ञः ॥ ९८ ॥ नि-
र्वाप्य चूर्णे प्रतिशोष्यशीतं छायाविशुष्कान् प्रविदार्य चाष्टीः ॥
चूर्णं च शुण्ठीमगधाविषाश्च सुगन्धिमूर्वाचविकान्विताश्च॥९९॥
निष्क्काथ्य कल्कः कुटजस्य तावद्द्व्योपलेपी भवतीति यावत् ॥
तस्यार्द्धभागेन गुडं विमथ्यात्क्षीरं तदर्द्धेन गवाऽजकं वा ॥१००॥
निर्वापितं तं घृतभाजने च संस्थापितं प्राङ्मुदितेन तेन॥सिन्धू-
त्थवह्नित्रिकटुं त्रिसुगन्धियुक्तं चूर्णं पुनर्गुडयुतं घृतमिश्रितं
च ॥ १०१ ॥ चूर्णेन तेन सकलग्रहणीयपाण्डुशोषाश्मरी कृमि-
जगुल्ममथातिसारान् ॥ प्लीहायकृच्छ्वासिषु मानवेषु विषूचिका
पीनसमस्तकार्त्तिम् ॥ १०२ ॥ विनाशनःसद्यस्तथा ज्वराणा-
मध्वश्रमक्षीणबलोदराणाम् ॥ ऐकाहिकादिज्वरनाशनःस्याल्ले-
होऽभयाद्योऽमृतवन्नराणाम् ॥ १०३ ॥ इत्यभयाद्योऽवलेहः ॥
५०० बड़ी हरड़ोंको १०० द्रोण गोमूत्रमें पकावे, कोमल अग्निसे पकनेमें जब चौथाई भाग
शेष रहे ॥ ९८ ॥ तब अग्निसे उतार उन हरड़ोंको छायामें सुखाके चीर गुठलियोंको
दूर करे, पीछे सूंठ, पीपल, अतीश, सफेद चंदन, मरोडफली, चव्य इनके चूर्णको यथायोग्य
मिला ॥ ९९ ॥ फिर अग्निपै पकावे और कडछीसे चलावे, जब कड़छीपे चिपने लगे तब उस
संपूर्ण औषधके समान गायका अथवा बकरीका दूध मिला ॥ १०० ॥ अग्निसे उतार घीके
चिकने वर्त्तनमें स्थापन करे, फिर सेंधानमक, चीता सूंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, इलायची,
तेजपात, गुड़, घृत इन्होंको मिलाके खावे ॥ १०१ ॥ यह सब प्रकारकी संग्रहणी, पांडु-
रोग, शोषरोग, पथरीरोग, कृमिरोग, पेटका गोला, सबप्रकारके अतिसार, तिल्लीरोग, जिगर-
रोग, श्वास, हैजा, जुखाम, पीनस, मस्तकरोग इनको नाशता है ॥ १०२ ॥ और
सबप्रकारके ज्वरवाले मार्गमें गमन करनेसे क्षीण बलवाले और उदररोगियोंको हित है और ऐका-
हिकआदि ज्वरोंको नाशता है । यह अभयाद्यवलेह मनुष्योंको अमृतके समान है ॥ १०३ ॥