हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८२ ) हारीतसंहिता ! [ तृतीयस्थाने-
दाह हो, अंग शिथिल हो जावे, मूर्च्छा, शिरमें शूल, ग्लानि, दीनपना ये उपजे, भ्रम हो
और विशेष करके अरति हो ये लक्षण कुछ कमपकी औषधके हैं ॥ ५८ ॥ इसकारणसे औष-
धिके शेषमें कहीं भी दोषका शमन नहीं है क्योंकि पाचनके विना दोष अनेक प्रकारसे कुपित
होते हैं ॥ ५९ ॥
अथ भोजनके उपरांत देनेके औषधके गुण ।
शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न हन्यादन्नावृतं न च मुहुर्वदनान्निरे-
ति ॥ प्राग्भुक्तसेवितमहौषधमेतदेव दद्याच्च वृद्धशिशुभीरुवराङ्ग-
नाभ्यः ॥ ६० ॥
अन्नसे आवृत हुआ औषध शीघ्र पकजाता है और बलको नाशता नहीं है और वारंवार
मुखसे नहीं निकलता है इसलिये प्रभातके भोजनके साथ सेवित किया औषध-वृद्ध, बालक, डर-
पोंक और स्त्री इनको सुख देता है ॥ ६० ॥
अथ वातज्वरमें पंचमूलका क्वाथ ।
बिल्वाग्निमन्थशुकनासकपाटलीनां कुम्भारिकाप्रयुतकं क्वथितं
कषायम् ॥ दन्तान्विशोधयति वारयते समीरं नाशं करोति
मरुतज्वरमाशु पुंसाम् ॥ ६१ ॥ मुस्ताकिरातसुरवल्लिकणास-
वित्र्यो गोकण्टको बृहतियुग्ममुदीच्यतिक्ताः॥स्याच्छाखिपर्णि-
कलशीक्वथितः समन्तात्क्वाथः समीरणभवं ज्वरमाशु हन्ति
॥ ६२ ॥ गुडूची शतपुष्पा च पृक्षी रास्ना पुनर्नवा ॥ त्राय-
माणकक्वाथश्च गुडैर्वातज्वरापहः ॥ ६३ ॥
बेलगिरी, अरनी, सोनापाठा, पाडल, कोहला, कुंभेरन इनका क्वाथ बना पीवे यह दन्तोंको
शोधता है और वातको दूर करता है मनुष्योंके वातज्वरको शीघ्र नाशता है ॥ ६१ ॥ चिरा-
यता, नागरमोथा, गिलोय, पीपल, लालआक, गोखरू, दोनोंकटेली, नेत्रवाला, कुटकी, पिठ-
वन, चौलाई, इन्होंका क्वाथ वातज्वरको अच्छीतरह नाशता है ॥ ६२ ॥ गिलोय, सौंफ,
पिठवन, रायसन, सांठी, त्रायमाण इनके क्वाथमें गुड़मिलाकर पीवे यह वातज्वरको
हरता है ॥ ६३ ॥
अथ पित्तज्वरके निदान और चिकित्सा ।
मूर्च्छादाहो भ्रममदतृषावेगतीक्ष्णोऽतिसारस्तन्द्रालस्यं प्रलपन-
वमीपाकतापश्च वक्त्रे ॥ स्वेदः श्वासो भवति कटुकं विह्वलत्वं
क्षुधा वा एतैर्लिङ्गैर्भवति मनुजे पैत्तिको वै ज्वरस्तु ॥ ६४ ॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu