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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १८१ )
धान रहे और भयकी इच्छा करे और भयभीतकी तरह सोवे परन्तु जागता ही रहे ये लक्षण
वातज्वरके हैं ॥ ५३ ॥
अथ वातज्वरका पाचन ।
नागरं सुरतरुश्च धान्यकं कुण्डली बृहत्तिकायुग निशम् ॥
सप्तमे निशि प्रशस्यते ज्वरे चाष्टमांशगतको हि अष्टवान्॥५४॥
सोंठ, देवदारु, धनियां, गिलोय, दोनों कटेली, हल्दी, दारुहल्दी इन आठ औषधोंकी
अष्टमावशेष पाचन संज्ञक काथ बना ज्वरमें सातवीं रात्रीको देना ॥ ५४॥ यह शुंठ्यादि पाचन
सब प्रकारके ज्वरोंमें देना चाहिये ॥
अथ अन्नहीन औषधका गुण ।
वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीनं हन्यात्तदामयमसंशयमाशु
चैव ॥ तद्वालवृद्धयुवतीमृदुभिश्च पीतंग्लानिं परां नयति चाशु
बलक्षयं च ॥ ५५ ॥
अन्नसे हीन हुआ औषध अधिक वीर्यवाला हो जाता है और रोगको निश्चय शीघ्र नाशता
है ॥ परन्तु बालक, वृद्ध, युवतीस्त्री, कोमल, इनकरके पिया हुआ वह अन्नरहित औषध परम-
ग्लानिको और बलक्षयको करता है ॥ ५५ ॥
अथ पाचन हुए औषधका लक्षण ।
इन्द्रियाणां लघुत्वञ्च नेत्रास्यस्य प्रसादता ॥
सोद्गारमुष्णता कोष्ठे जीर्णभेषजलक्षणम् ॥ ५६ ॥
इंद्रियोंका हलकापन हो नेत्र और मुखकी प्रसन्नता रहे , डकार आवे, कोष्ठमें गर्माई रहे ये
पके हुए औषधके लक्षण हैं ॥ ५६ ॥
अथ अपक्व औषधका गुण ।
क्लमहृल्लाससदनं शिरोरुग्भ्रंशमेव च
उत्क्लेदो जायते यस्य विद्यादुत्क्राममौषधम् ॥ ५७ ॥
ग्लानि और थुकथुकी हो, शरीर शिथिल हो जावे, शिरमें शूल और फूटन उपजे और वम
नसा आनेकी तरह होवे ये नहीं जीर्ण हुए औषधके लक्षण हैं ॥ ५७ ॥
अथ पाचन होनेमें कुछ शेषरहे औषधका लक्षण ।
दाहाङ्गसदनं मूर्च्छा शिरोरुक्क्लसदीनता ॥ भ्रमोऽरतिविशेषेण
सविशेषौषधाकृतिः ॥ ५८ ॥ तस्मादौषधशेषे तु न दोषशमनं
क्वचित् ॥ कुप्यन्त्यनेकधा दोषा न देयं पाचनं विना ॥५९॥
१ सर्वज्वरेषु नागरादिपाचनं देयम् ।
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu