हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७३ )
तोपायसंयुता ॥ ५ ॥ पठितव्या समासेन संहिताज्ञानहेतवे ॥
ज्ञात्वा रोगप्रतीकारं ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ६ ॥
इसलिये रोगके निवारण करनेवाले कारणसे संयुक्त सब उपाय करके निदानके लक्षण
और रोगोंसे तथा रोगप्रतीकारकी चिकित्सासे अन्वित हुई वैद्यकसंहिता ॥ ५ ॥
विस्तार करके पठितकरनी योग्य है, संहिताके ज्ञानके लिये और रोगको दूर करनेके उपायको
जानकर पीछे चिकित्साको करे ॥ ६ ॥
रोग नहीं जाननेसे हानि ।
अविज्ञाय रुजं सम्यङ्मोहादारभते क्रियाः ॥
विधानज्ञोऽथ शास्त्रज्ञो न तत्सिद्धिः प्रजायते ॥ ७ ॥
जो वैद्य रोगको नहीं जानके क्रियाका आरंभ करता है वह विधानको और शास्त्रको जानने-
वाला भी सिद्धिको प्राप्त नहीं होता ॥ ७ ॥
अथ वैद्यशास्त्रज्ञाताको फल ।
निदानं रोगविज्ञानं भेषजानां गुणागुणम् ॥
विज्ञाय कुरुते यस्तु तस्य सिद्धिर्न दूरतः ॥ ८ ॥
निदान और रोगको जानना, औषधियोंके गुण और दोष इनको जानके जो वैद्य क्रियाको
दूर नहीं करता है उसको शीघ्र सिद्धि होती है ॥ ८ ॥
रोगादिक जाननेकी आवश्यकता ।
आदावेव रुजां ज्ञानं साध्यासाध्यं विचक्षणः ॥
याप्यं सर्वरुजाञ्चैव ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ९ ॥
आदिमें वैद्य रोगके ज्ञानको और साध्य और असाध्यरूपको तथा कष्टसाध्यपनेको जाने
पीछे क्रियाको करे ॥ ९ ॥
अथ देशकालआदिक जाननेकी आवश्यकता ।
देशं कालं वयो वह्निसात्म्यं प्रकृतिभेषजम् ॥
एवं विज्ञाय सद्वैद्यस्ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ १० ॥
देश, काल, अवस्था, अग्नि, स्वभाव, प्रकृति इनको जानके कुशल वैद्य चिकित्साको
करे ॥ १० ॥
अथ रोगहेतुवातादिदोष ।
नास्ति रोगो विना दोषैर्दोषा वातादयः स्मृताः॥
ज्वराद्यः स्मृता रोगास्तान्सम्यक्परिलक्षयेत् ॥ ११ ॥