हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
उत्तरको अथवा पूर्वको या अपनी और मुख कराकर रोगीको बैठावे पीछे ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवा-
चन कराके काथका पान करावे ॥ ७२ ॥ पीछे पीनेके पात्रको अधोमुख स्थापित कर
जागता हुआ शयन करे और काथका पान करक तृषावाला भी दो घडीतक पानीको नहीं
पीवे ॥ ७३ ॥ जब रोगीकी ग्लानि दूर होजावे तब रोगी सुखको प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने
औषधपरिज्ञानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः २.
अथ ज्वरचिकित्सा ।
आत्रेय उवाच॥अनभिज्ञश्चिकित्सायां शास्त्राणां पठनेन किम् ॥
यथा पलाल बीजास्तु रहितं निष्प्रयोजकम् ॥ १ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-जो वैद्य चिकित्साकर्ममें कुशल नहीं हो और वैद्यशास्त्रके पठनमें
कुशल हो तिसको क्या फल होता है अर्थात् कुछ नहीं अन्नसे रहित निष्प्रयोजन तुषसे क्या
तत्त्व निकलता है ? ॥ १ ॥
अथ कुवैद्यनिंदा ।
वरमाशीविषविषं क्वथितं ताम्रमेव च॥ पीतमत्यग्निसन्तप्ता भ-
क्षिता वाप्ययोगुडाः ॥२॥ न तु श्रुतवतां वेशं बिभ्रतां शरणाग-
तात् ॥ ग्रहीतुमन्नपानं वा वित्तं वा रोगपीडितात्॥ ३ ॥
सर्पादिकका विष, उबाला हुआ तांबा, अत्यंत अग्निमें तप्त किये लोहाके गोले इन सबोंको
सेवना भी हित है ॥ २ ॥ परंतु वैद्योंके वेशको धारण करनेवाले और रोगियोंसे अन्न, पान,
धन इनको हरनेवाले ऐसे वैद्योंकी औषधको नहीं खावे ॥ ३ ॥
अथ वैद्यका लक्षण ।
तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय जायते ॥
स चैव भिषजां श्रेष्ठो रोगेभ्योयो विमोक्षयेत् ॥ ४ ॥
जो आरोग्यको करता है वही योग्य औषध है और जो रोगोंसे छुडावे वह ही उत्तम वैद्य
कहाता है ॥ ४ ॥
अथ वैद्यकशास्त्रपठनकी आवश्यकता ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रोगवारणहेतुना॥युक्ता निदानलक्षैस्तु संहि-