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सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 121

अ० १६ ] भाषाटीकासमेता । (८९)
षोडशोऽध्यायः १६.
अथ शाकवर्ग ।
शाकं चतुर्विधं प्रोक्तं पत्रं पुष्पं फलं तथा ॥ कन्दं चापि समुद्दिष्टं
वक्ष्याम्येतत्पृथक्पृथक् ॥ १ ॥ द्विविधं शाकमुद्दिष्टं गुरु विद्यात्त-
थोत्तरम् ॥ प्रायः सर्वाणि शाकानि विष्टम्भीनि गुरूणि च ॥ २ ॥
रूक्षाणि बहुवर्चांसि सृष्टविण्मरुतानि च ॥
पत्र, पुष्प, फल, कंद इन भेदोंसे शाक चार प्रकारका कहा है उसे पृथक् पृथक् कहता
हूँ ॥ १ ॥ शाक २ प्रकारका कहा है इनमें उत्तरोत्तर भारी है अर्थात् कन्द सबसे भारी है
और विशेष करके सब शाक विष्टम्भको करती हैं, भारी हैं ॥ २ ॥ रूखी हैं बहुत मलवाली हैं
विष्ठा और अधोवातको करती हैं ।
अथ पृथक् पृथक् शाकोंके गुणदोष ।
जीवंती शाकके गुण ।
चक्षुष्या सर्वरोगघ्नी जीवन्ती मधुरा हिमा ॥ ३ ॥
जीवंती शाक नेत्रोंमें हित है, सब रोगोंको नाशती है, मधुर और शीतल है ॥ ३ ॥
अथ चौलाई शाकके गुण ।
स्वादुपाकमसृक्पित्तविषघ्नं तण्डुलीय कम् ॥
विविधवातविड़्हन्ता मूत्रवातकफे हितः ॥ ४ ॥
चौलाई शाक पाककालमें स्वादु है और रक्तपित्त और विष इनको नाशती है, अनेक प्रकारके
वात और विष्ठाको हरती है और मूत्र, वात और कफ इनमें हित है ॥ ४ ॥
अथ कासविंदाके शाकके गुण ।
मधुरः कफवातघ्नः पाचनः कण्ठशोधनः ॥
विशेषतः पित्तहर इत्युक्तः कासमर्दकः ॥ ५ ॥
कासविंदाशाक मधुर है, कफको और वातको नाशता है, पाचन है, कंठको शोधता है और
विशेष करके पित्तको हरता है ॥ ५ ॥
अथ जयंती और मकोह शाकके गुण ।
जयंती वातकफकृत्पित्तसंशमनी तथा ॥
त्रिदोषशमनी वृष्या काकमाची रसायनी ॥ ६ ॥