हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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लेकर खड़े थे और डींग हाँककर कहते थे कि हम राजपूतों को घास
के समान काट डालेंगे । दोनों दल साहसपूर्वक जी खोलकर लड़े,
किंतु राजपूतों के लगातार आक्रमण के आगे मुसल्मानों को हटना
पड़ा । अतएव उनमें से बहुतों ने रणक्षेत्र त्याग दिया और वे अपना
प्राण लेकर भागे । कुछ काल पीछे समस्त मुसल्मानी सेना ने इसी
रीति का अनुसरण किया और वह कायरता से युद्धक्षेत्र से भागी;
राजपूतों की पूरी विजय हुई ।
जब युद्ध समाप्त हो गया तब सीधे सादे राजपूत लोग युद्धस्थल
में अपने मरे और घायल लोगों को उठाने आए । इस खोज में
उन्होंने बहुत सा धन, शस्त्र, हाथी और घोड़े पाए । शत्रु की बहुत
सी स्त्रियाँ उनके हाथ आईं । रतिपाल ने आते हुए प्रत्येक नगर में
उनसे मट्ठा बेचवाया ।
हम्मीर शत्रु के ऊपर अपने सेनापतियों की इस विजयप्राप्ति से
अत्यंत प्रसन्न हुए । इस घटना के उपलक्ष में उन्होंने एक बड़ा दरबार
किया । दरबार में राजा ने रतिपाल को सोने की सिकरी पहनाई,
और उसकी तुलना युद्ध के हाथी से की जो सुवर्ण के पट्टे का
अधिकारी होता है । दूसरे सरदार और सिपाही लोग भी अपनी
अपनी योग्यता के अनुसार पुरस्कृत किए गए और अनुग्रहपूर्वक उन्हें
अपने अपने घर जाने की आज्ञा मिली ।
मोगल सरदारों के सिवाय और सब लोग चले गए । हम्मीर ने
यह बात देखी और कृपापूर्वक उनसे रह जाने का कारण पूछा ।
उन्होंने उत्तर दिया कि कृतघ्न भोज को, जो जगरा में जागीर भोग
रहा है, दंड देने के पहले हम तलवार म्यान में करना और अपने
घर जाना बुरा समझते हैं । उन्होंने कहा कि राजा के संबंध के
कारण ही हम लोगों ने उसे अब तक जीता छोड़ा है; किंतु अब वह
इस सहनशीलता के योग्य नहीं रहा क्योंकि उसी की प्रेरणा से शत्रु
ने रणथंभौर प्रदेश पर चढ़ाई की थी । अतएव उन्होंने जगरा पर
चढ़ाई करके भोज पर आक्रमण करने की अनुमति मांगी । राजा ने