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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 258 में से

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पृष्ठ 31

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इसी समय राव रणधीर जी ने हम्मीर जी से कहा कि यदि
चित्तौर से दोनों कुमार बुला लिए जायँ तो अच्छा हो। इसपर
राव जी ने भी “अच्छा” कह दिया। तब राव रणधीर ने रणथंभ
का सब समाचार लिखकर चित्तौर भेज दिया। उक्त समाचार के
पाते ही दोनों राजकुमार तीस हजार राठौर, आठ हजार चहुआन,
और पाँच हजार प्रमार राजपूतों की सेना लेकर रणथंभ को चले
आए। दोनों राजकुमारों को देखकर राव हम्मीर जी ने प्रसन्नता-
पूर्वक उन्हें गले लगा लिया और मीर महिमा को शरण देने के कारण
अलाउद्दीन से रार बढ़ जाने का हाल भी विधिवत् वर्णन कर सुनाया,
जिसे सुनते ही दोनों राजकुमारों का मुख प्रसन्नता से प्रफुल्लित हो
उठा। उन्होंने वीर रस में उन्मत्त होकर मदांध मृगराज की भाँति
झूमते हुए राव जी से कहा कि अब तक आपने परिश्रम किया अब
तनिक हमारा भी पराक्रम देख लीजिए। यों कहकर दोनों राजकुमार
रनिवास में गए। राव हम्मीर की रानी आसुमती के चरण छूकर वे
बोले कि हे माता आप कृपा कर हमारे मस्तक पर मौर बाँधकर हमें
युद्ध करने का आशीर्वाद दीजिए। दोनों राजकुमारों के ऐसे वचन
सुनकर आसुमती ने भी सुतस्नेह से सने हुए वाक्यों से संबोधन
करते हुए उन्हें कलेजे से लगा लिया और अपने हाथों उनके शीश
पर मौर बाँधा और केशरी बाना पहिनाकर उन्हें युद्ध में जाने को
बिदा किया।
जिस समय आसुमती कुमारों का श्रृंगार कर रही थी उस समय
छाड़गढ़ के किले में इस प्रकार घनघोर रव हो रहा था कि जिससे
दिशाओं के दिग्पाल चौकन्ने हो रहे थे। यह खरभर देखकर अला-
उद्दीन ने अपने मंत्री से पूछा कि आज छाड़गढ़ में यह उत्सव
किसलिये हो रहा है। तब एक अमीर ने उत्तर दिया कि राव हम्मीर
जी के छोटे भाई के पुत्रों ने स्वयं युद्ध के लिये सिर पर मौर बाँधा
है। उसी के उत्सव में यह गान-वाद्य हो रहा है। यह सुनकर बाद-
शाह ने जमाल खाँ को बुलाकर कहा कि तुमने ही पृथ्वीराज को कैद
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