हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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हम्मीररासो १५३
मनो पब्वतं¹ अंग दीखंत जैसे ॥
कसे साठि² हौदा परे खेत माहीं ।
ज़रावं जरं कंचनं कै सुमाहीं । ६१२॥
परे डंबर' सौ कई गज्जराजं ।
कई प्राणहीनं कई मो समाजं ॥
परे सत पंचं निसानन्नवारे ।
किते फग्जराजं परे खेत भारे ॥९१३॥
सवा लक्ख बाजी परे जे अमाँनं ।
परे खेत साहं सिकंदर सुजाँनं ॥
तिनै साह³ लक्खं बँधारं सवायं ।
परे एक⁴ लक्खं दिलीसं सुपायं ॥९१४॥
दुहूँ इक्क⁵ मीरं परे खेत नामी ।
कहूँ नाँम ताकै परै खेत बामी ॥
परे दूसरे मीर सिर खाँन भारी ।
रहे खेत महरम्म खाँनं सुधारी ॥ ९१५॥
परे जौमजादेन से मीर नामी ।
मोहोबत्त मुद्दफ्फर परे इक्क ठामी ॥
परे नूर मीरं अफर्रस्स धोरं, ।
बली इक्क निज्जाँम दीनं सु पीरं ॥९१६॥
परे मीर एते दुहूँ खेत सूरं ।
बहै नोर ड्यों रक्त⁶ बाहंत कूरं⁷ ॥
नची जुग्गनी और भैरव सु नच्चैं ।
भखैं गिद्ध आमिष जंबू सु रुच्चैं ॥९१७॥
थके सूर रथ्थं सु जाँमं सवायं ।
महाबीर घायं स घूमंत तायं ॥
[Footnotes]
१ पब्वयं । २ सट्ठि । ३ सांत । ४ इक्क । ५ एक । ६ रक्त । ७ सूरं, पूरं ।
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