हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहम्मीररासो · १४३
दुर्योधन दसकंध सु जोई¹ ॥
काको गढ़ काकी यह दिल्लो ।
हरि की दई हमें तुम मिल्ली ॥८५१॥
हम तुम अंस एक उपजाए ॥
आदि पद्म रिषि अंग उपाए ॥
देव दोष उर घर भए न्यारे ।
हम हिंदु तुम यवन हँकारे ॥८५२॥
तजिये भोग भूमि कै सबहीं ।
चलिये सुरपुर बसिये अबहीं ॥
सग हमारो पहुँच्यो जाई ।
हम तुम रहें सबहिं पहुँचाई ॥८५३॥
गहो हथ्यार राज सब इंडो ।
राखो जस तन खंडि बिहंडो ॥
अबै चालि सुरपुर सुख मंडो
मृत्युलोक² कै भोग सु इंडो ॥८५४॥
छंद त्रोटक
यह बात³ कही चहुवाँन तबै ।
सुनि साह सबै भर पेलि जबै ॥
करि साज सबै रण मंडि महा ।
तिन भारथ पारथ जुद्ध सुहा ॥८५५॥
दल संग चढ़े सब सूर असी ।
सब तोप सु बाँन कमाँन कसी ॥
गजराज अनेक बनाय घने ।
मनो पावस बहल मेघ तने ॥८५६॥
हय कंद अमंद सु पोन मनो ।
१ कोड, जोड अंत्यानुप्रास । २ मर्त्यलोक । ३ बत्त ।