हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ हम्मीररासो।
जौ न सिंह के मुख चढ़ै, सो भिल्लै इन सार ॥५३४॥
चौपाई छंद
कहै वजीर साह सुनि बत्तं ।
मीर अरब्बिय¹ जानि सु तत्तं ॥
मर्कट बदन² सूकर सम³ काँनं ।
द्रग मंजार बेसू खल जाँनं⁴ ॥५३५॥
तुम⁵ साँमत प्रथिराज सु अग्गैं ।
गढ़ गज्जनि आए⁶ गहि खग्गैं ॥
तुमहिं दिली के तख्त बसाए⁷ ।
गौरीसा कै भए सहाए ॥५३६॥
वै⁸ दोउ कुमर पकरि अब लावैं ।
सन्मुख होइ तो⁹ मारि गिरावैं¹⁰ ॥
सुनि वजीर के बचन सुहाए ।
मीर जमालखाँन बुलवाए¹¹ ॥५३७॥
कहै साह सुनि मीर जमालं ।
है यह काम तुम्हारे हालं ॥
आगै¹² तुम गहियो प्रथिराजं ।
त्यों¹³ तुम गहो कुँमर दोउ आजं ॥५३८॥
छप्पय छंद
सुणि जमाल खाँ मीर हत्थ¹⁴ धरि मुच्छ सँवारिय¹⁵ ।
पाव परसि कर जोरि कवन बड़ काज¹⁶ निहारिय¹⁷ ॥
१ अरबी । २ मुख । ३ सुक्कर इव । ४ द्रगमजार बपुष (कू)
खल जानं (जानहु) । ५ तिहिं सामत । ६ गजनी लाये । ७ बैसाये,
बठाये । ८ वैदुव कुँमर पकरि गहि ल्याऊँ । ६ तोयसो । १० गिराऊँ ।
११ बुल्लाए । १२ अग्गै । १३ तिम । १४ हाथ । १५ बकारिय ।
१६ कज । १७ निकारिय ।
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri