गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोरक्षशतकम् ( ३५ )
उपाधिश्च तथा तत्त्वं द्वयमेवमुदाहृतम् ।
उपाधिः प्रोच्यते वर्णस्तत्त्वमात्माभिधीयते ॥ ८९ ॥
उपाधि और तत्त्व ये दोनों पृथक हैं। वर्ण (आकार) को उपाधि कहा
जाता है तथा तत्त्व को आत्मा कहते हैं ॥ ८९ ॥
उपाधिरन्यथाज्ञानं तत्त्वं संस्थिमयन्यथा।
समस्तोपाधिविध्वंसि सदाभ्यासेन योगिनाम् ॥ ९० ॥
उपाधि अन्यथाज्ञान (मिथ्याज्ञान) है, किन्तु तत्व वास्तविक ज्ञान है।
योगी निरन्तर अभ्यास से सभी उपाधियों का विध्वंस (नष्ट) करते है ॥ ९० ॥
आत्मवर्णेन भेदेन दृश्यते स्फाटिको मणिः ।
मुक्तो यः शक्तिभेदेन सोऽयमात्मा प्रशस्यते ॥ ९१ ॥
स्फटिक मणि पर आत्मवर्ण (जिस वर्ण का प्रतिबिम्ब पड़ता है) उसी
वर्ण (उसी रंग) का यह दिखता है। (आत्मा के साथ भी ऐसा ही होता है।)
वर्ण (रंग संस्कार आदि उपाधियों) के शक्ति-भेद से जो मुक्त है, वही आत्मा
प्रशस्त है ॥ ९१ ॥
निरातंकं निरालंबं निष्प्रपंचं निराश्रयम् ।
निरामयं निराकारं तत्त्वं तत्त्वविदो विदुः ॥ ९२ ॥
निरातंक (निर्भय), निरालम्ब (आलम्बन रहित), निष्प्रपंच (प्रपंच से
भिन्न), निराश्रय (आश्रय रहित), निरामय (रोग रहित), निराकार (किसी
भी प्रकार के आकार से रहित) स्वरूप वाला तत्व (आत्मा) है। तत्वविद् ऐसा
जानते है ॥ ९२ ॥
शब्दाद्याः पंच या मात्रा यावत्कर्णादिषु स्मृताः ।
तावदेव स्मृतं ध्यानं तत्समाधिरतः परम् ॥ ९३ ॥
शब्द आदि (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) कर्ण आदि इन्द्रियों के विषय
है। यहां तक स्मृति ध्यान है। इसके उपरान्त समाधि है ॥ ९३ ॥
यदा संक्षीयते प्राणो मानसं च विलीयते ।
तदा समरसैकत्वं समाधिरभिधीयते ॥ ९४ ॥