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सर्वकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 45 में से

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पृष्ठ 31

. ( २४ ) गोरक्षनाथप्रणीतः
महामुद्रां नभोमुद्रामुड्डियानं जलंधरम्।
मूलबंधं च यो वेत्तिः स योगी सिद्धिभाजनम् ।। ३२ ।।
जो योगी महामुद्रा, नभोमुद्रा (खेचरी मुद्रा), उड्डियान बंध, जालन्धर
बन्ध और मूलबंध जानता (अभ्यास में निष्णात) है वही योगी सिद्धि (मुक्ति)
प्राप्त करने का अधिकारी होता है ।। ३२ ।।
वक्षोन्यस्तहनुर्निपीड्य सुचिरं योनिं च वामांघ्रिणा
हस्ताभ्यामवधारितं प्रसरितं पादं तथा दक्षिणम् ।
आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बंद्ध्वा शनैः रेच येदेषा ।
पातकनाशिनी सुमहती मुद्रा नृणां प्रोच्यते ।। ३३ ।।
वक्ष (हृदय) में ठोढी को लगाकर साधक बाएं पांव (की एड़ी) से
योनिस्थान को देर तक दबाकर रखे तथा दोनों हाथों से फैले हुए दाहिने पांव
को पकड़े और दोनों कुक्षियों को पूरक द्वारा वायु से भरे, फिर (कुम्भक द्वारा
रोककर और रेचक द्वारा) धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। यह मनुष्यों की सभी
पातकनाशिनी (व्याधिविनाशिनी) महामुद्रा कही जाती है ।। ३३ ।।
कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा ।
भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टर्मुद्रा भवति खेचरी ।। ३४ ।।
जिह्वा (जीभ का अग्रभाग) को उलटा लौटाकर कपाल-कुहर में प्रविष्ट
कराया जाता है और दृष्टि दोनों भौहों के बीच में स्थिर की जाती है। यही
खेचरी मुद्रा है ।। ३४ ।।
ऊर्ध्व मेढ्रादधो नाभेरुड्डियानं प्रचक्षते ।
उड्डियानजयो बंधो मृत्युमातंगकेसरी ।। ३५ ।।
मेढ़्र से ऊपर और नाभि से नीचे भाग को उड्डियान बन्ध कहा जाता है।
(उड्डियान बन्ध में इस भाग को पीछे (अन्दर) की ओर खिंचना होता है।)
उड्डियान बन्ध सिद्ध होने पर यह मृत्युरूपी हाथी के लिये सिंह के समान है ।। ३५ ।।
जालंघरे कृते बंधे कंठसंकोचलक्षणे ।
न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति ।। ३६ ।।