गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २० ) गोरक्षनाथप्रणीतः
अंगुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासग्रमालोकये-
देतद्व्याधिविकारहारि यमिनां पद्मासनं प्राच्यते ॥ ९ ॥
वाम जंघा (जंघा के मूल में) दाहिना पांव (चरण) स्थापित करे तथा
उसी प्रकार दाहिनी जंघा पर वायां पांव स्थापित करें और दोनों हाथों को पीछे
से ले जाकर दाहिने हाथ से बाएं पांव के अंगूठे और बाएं हाथ से दाहिने पांव
के अंगूठे को दृढ़ता से पकड़कर एवं चिबुक को हृदय से लगाकर नासिका के
अग्रभाग को (दोनों नेत्रों से) देखें। इसे समस्त व्याधियों और (शारीरिक एवं
ानसिक) विकारों को नष्ट करनेवाला पद्मासन कहा गया है ॥ ९ ॥
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ।
योनिस्थानम् द्वयोर्मध्ये कामरूपम् निगद्यते ॥ १० ॥
आधार (मूलाधार) चक्र पहला है, दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान है। दोनों के
मध्य में स्थित योनिस्थान को कामरूप कहा जाता है ॥ १० ॥
आधाराख्ये गुदस्थाने पंकजं यच्चतुर्दलम् ।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवंदिता ॥ ११ ॥
मूलाधार चक्र जो गुदास्थान में है और जो चार (कमल) दलों से युक्त है.
उसके मध्य में (त्रिकोणाकार) योनि है। यह (योनि) सिद्धों द्वारा कामाक्षा
(कामाक्षा पीठ) कहा गया है ॥ ११ ॥
योनिमध्ये महालिंगं पश्चिमाभिमुखं स्थितम् ।
मस्तके मणिवद्भिन्नम् यो जानाति स योगवित् ॥ १२ ॥
उस (कामाक्षा) योनि के मध्य में पश्चिमाभिमुख महालिंग स्थित है।
उस महालिंग के मस्तक में मणि के सदृश (प्रदीप्त) बिम्ब को जो जानता है
वही योगवेत्ता है ॥ १२ ॥
तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ।
चतुरस्रं पुरं वन्हेरोधोमेढ्रात्प्रतिष्ठितम् ॥ १३ ॥
मेढ्र से नीचे (मूलाधार पद्म की कर्णिका में) तपे हुये सोने के वर्ण की
आभा और विद्युल्लेखा के सदृश ज्योतिर्मय चतुरस्त्राकार अग्निमय (वह
योनिस्थान) है। (पाठान्तर त्रिकोणाकार भी है) ॥ १३ ॥