सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 98

६० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३३ ॥
वै दक्षिणास्तद्यज्ञ इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् १२, एतद्ध स्मैतद्विद्वांसमोपाका-
रिमासस्तुर्ब्रह्मचारी ते संस्थित इत्यथैत आसस्तुराचित इव चितो बभूवाथो-
त्थाय प्राव्राजोदित्येतद्वाऽहं वेद नैतासु योनिष्वित एतेभ्यो वा मिथुनेभ्यः सम्भूतो
ब्रह्मचारी मम पुरायुषः प्रेयादिति ॥ ३३ ॥
कण्डिका ३३ ॥ सावित्री वा गायत्री मन्त्र के चौबीस उत्पत्ति
स्थान और बारह जोड़ा ॥
(मनः एव सविता वाक् सावित्री) [मौद्गल्य ने कहा]—मन ही सविता
[चलाने वाला] और वाणी सावित्री [चलाने वाले की उपासिका वा सेविका है, (यत्र
हि एव मनः तत् वाक्, यत्र वै वाक् तत् मनः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम्)
जहां पर ही मन है, वहां वाणी है जहां पर ही वाणी है वहां मन है, यह दो योनि
[उत्पत्ति स्थान] और एक जोड़ा है। १। (अग्निः एव सविता पृथिवी सावित्री)
अग्नि ही सविता [चलाने वाला] और पृथिवी सावित्री [चलाने वाले की उपासिका]
है, (यत्र हि एव अग्निः तत् पृथिवी यत्र वै पृथिवी तत् अग्निः इति एते द्वे योनी
एकं मिथुनम्) जहां पर ही अग्नि है वहां पृथिवी है, जहां पर ही पृथिवी है वहां अग्नि
है, यह दो उत्पत्तिस्थान और एक जोड़ा है। २। (वायुः एव सविता अन्तरिक्षम्
सावित्री) वायु ही सविता और अन्तरिक्ष सावित्री है, (यत्र हि एव वायुः तत्
अन्तरिक्षम् यत्र वै अन्तरिक्षं तत् वायुः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम्) जहां पर
ही वायु है वहां अन्तरिक्ष है, और जहां पर ही अन्तरिक्ष है वहां वायु है, यह दो उत्पत्ति-
स्थान और एक जोड़ा है। ३। (आदित्यः एव सविता द्यौः सावित्री) सूर्य ही चलाने
वाला और प्रकाश चलाने वाले की सेवा करने वाली है, (यत्र हि एव आदित्यः तत्
द्यौः यत्र वै द्यौः तत् आदित्यः इति द्वे योनी एकं मिथुनम्) जहां पर ही सूर्य है
वहां प्रकाश है, जहां पर ही प्रकाश है वहां सूर्य है, यह दो उत्पत्तिस्थान और एक जोड़ा
है। ४। (चन्द्रमाः एव सविता नक्षत्राणि सावित्री) चन्द्रमा ही चलाने वाला और
नक्षत्र चलाने वालों की सेवा करने वाली है, (यत्र हि एव चन्द्रमाः तत् नक्षत्राणि यत्र
वै नक्षत्राणि तत् चन्द्रमाः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम्) जहां पर ही चन्द्रमा
है, वहां नक्षत्र [तारागण] हैं, जहां पर ही नक्षत्र हैं वहां चन्द्रमा है यह दो उत्पत्ति
स्थानम् (मिथुनम्) क्षुधिपिशिमिथिभ्यः कित् (उ० ३। ५५) मिथ वधे
मेधायां च—उनन् कित् । द्वयोः संयोगः । (अवभृथम्) अपो विभर्ति, अप्+भृञ्
भरणे—कः । मेघः (विद्युत्) भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जि० (पा० ३। २। १७७)
वि+द्युत दीप्तौ—क्विप् । तडित् । अशनिः (स्तनयित्नुः) स्तनितनिहिष्वपुषिगदि-
मदिभ्यो णेरित्नुच् (उ० ३। २९) स्तन देव शब्दे—इत्नूच् । मेघशब्दः । (प्राणः)
प्र+अन जीवने—घञ् । नासाग्रस्थानवर्ती वायुः, तस्य कर्म बहिर्गमनम् (अन्नम्)
ऋवृजॄसिद्रुपन्थनिखपिभ्यो नित् (उ० ३। १०) अन जीवने-नः प्रत्ययः । यद्वा