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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 600 में से

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पृष्ठ 89

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २३ ॥ ५१

त्वा-इत्यादि यजुर्वेद के पहिले मन्त्र को इस प्रकार आरम्भ करके यजुर्वेद पढ़ते हैं ।
( साम्नाम् आदित्यः देवतं तत् एव ज्योतिः जागतं छन्दः द्यौः स्थानम् )
सामवेद के मन्त्रों में [ पहिले मन्त्र का ] आदित्य देवता, वही ज्योति, जगती छन्द और
प्रकाश लोक स्थान है । ( अग्न आयाहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि
बर्हिषि-इति एवम् आदिं कृत्वा सामवेदम् अधीयते ) अग्न आयाहि० इत्यादि [ साम-
वेद के पहिले मन्त्र को ] इस प्रकार आरम्भ करके सामवेद पढ़ते हैं [ इस मन्त्र का छन्द
गायत्री है, यहाँ जागत वा जगती माना है ] ।
( अथर्वणां चन्द्रमाः देवतं तत् एव ज्योतिः, सर्वाणि छन्दांसि, आपः
स्थानम् ) अथर्ववेद के मन्त्रों में [ इस मन्त्र का ] चन्द्रमा देवता, वही ज्योति, सब छन्द,
आप् [ व्यापक जल ] स्थान है । ( शन्नो देवीरभिष्टये इति एवम् आदिं कृत्वा
अथर्ववेदम् अधीयते ) शन्नो देवीः-इत्यादि अथर्ववेद के मन्त्र को इस प्रकार आरम्भ
करके अथर्ववेद पढ़ते हैं । [ यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड १ सूक्त ६ का पहिला मन्त्र है,
अथर्ववेद का पहिला मन्त्र यह है- ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः ।
वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे । शन्नो देवीः--इस मन्त्र का छन्द गायत्री
है और यहाँ सब छन्द माने हैं । ] ( अद्भ्यः स्थावरजङ्गमः भूतग्रामः सम्भवति,
तस्मात् सर्वम् आपोमयम्, सर्वं भूतं भृग्वङ्गिरोमयम् ) आप् [ जल ] से स्थावर और
जङ्गम प्राणियों का समूह उत्पन्न होता है, इसलिये सब जगत् आपोमय [ जल से परिपूर्ण ]
है और सब प्राणीमात्र भृग्वङ्गिरोमय [ प्रकाशमान ज्ञान वाले परमात्मा से परिपूर्ण ] हैं,
( एते त्रयःवेदाः भृगून् अङ्गिरसः अन्तरा श्रिताः इति, अप् इति, अपां प्रकृतिः
ओङ्कारेण च ) और यह तीनों वेद [ अर्थात् कर्म उपासना ज्ञान ] प्रकाशमान ज्ञान वाले
[ चारों वेदों ] के भीतर आश्रित हैं, [ अन्तर्गत हैं--देखो कण्डिका ३६ ], यही अप्,
व्यापक जल रूप परमात्मा है और ओङ्कार द्वारा जलों की प्रकृति [ रचना ] है [ कौन
प्रकृति है-कण्डिका २४ के प्रश्न का यह उत्तर है ] । ( एतस्मात् व्यासः पुरा उवाच )
इसलिये व्यास [ वेदों के अर्थ प्रकाश करने वाले मुनि ] ने पहिले कहा था-
( अद्भ्यः ) जलेभ्यः ( भूतग्रामः ) प्राणिसमूहः ( सम्भवति ) उत्पद्यते ( आपो-
मयम् ) जलपरिपूर्णम् । ( भूतम् ) प्राणिसमूहः ( भृग्वङ्गिरोमयम् ) प्रकाश-
मानज्ञानस्वरूपपरमात्मना परिपूर्णम् ( अन्तरा ) विना ( त्रयः वेदाः ) कर्मोपासना-
ज्ञानरूपाः ( भृगून् ) प्रकाशमानान् ( अङ्गिरसः ) ज्ञानयुक्तांश्चतुर्वेदान् ( अप् )
व्यापकजलरूपपरमात्मा ( प्रकृतिः ) रचना ( अपाम् ) जलानाम् ( व्यासः ) वि+
असु क्षेपणे - घञ् । विशेषेण वेदार्थप्रकाशको विद्वान् (पुरा) अग्रे (भृग्वङ्गिरोविदा)
प्रकाशमानज्ञानयुक्तचतुर्वेदज्ञेन ( संस्कृतः ) उपनयनादिसंस्कारं प्राप्तः ( अन्यान्
वेदान् ) वेदभिन्नशास्त्राणि ( अधीयीत ) पठेत् । ( अन्यत्र ) वेदभिन्नशास्त्रेषु
( भृग्वङ्गिरसः ) प्रकाशमानज्ञानयुक्तचतुर्वेदान् (खिल्श्रुतिः) खिल् कणश आदाने-
कः । सारभूतमन्त्रः ( वेदः ) विद ज्ञाने--कर्तरि घञ् । वेत्ता ।