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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 600 में से

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पृष्ठ 82

४४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २६ ॥
गच्छेत् ) जो पुरुष उस [ स्वर मात्रा ] का नित्य ध्यान करे, वह अनामक पद [ नामशून्य
परमात्मा के स्थान ] को पावे । ( ओंकारस्य च उत्पत्तिः यः विप्रः न जानाति तत्
पुनः उपनयनम् ) और ओंकार की उत्पत्ति को जो ब्राह्मण नहीं जानता उसका फिर
उपनयन संस्कार होवे [ अर्थात् वेद की विद्या फिर आरम्भ से पढ़े ] ।
( तस्मात् ब्राह्मणवचनम् आदर्त्तव्यम् ) इसलिये ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञानी ]
का वचन आदर योग्य है-- [ पाँच प्रश्नों के यह उत्तर हैं ] ( यथा ) जैसे [ यह
बात ] ( लातव्यः ) ग्रहण योग्य है । ( गोत्रः ) पृथिवी का रक्षक १, ( ब्रह्मणः पुत्रः )
ब्रह्मा का पुत्र [ कण्डिका १६ ] २, ( गायत्र छन्द ) गायत्री [ दैवी गायत्री ]
छन्दः ३, ( शुक्लः वर्णः ) शुक्ल वर्ण [ आदित्य वर्ण ] ४, और ( पुंसः १ ) बढ़ाने वाला
( वत्सः ) बसाने वाला. ( रुद्रः ) ज्ञान देने वाला, ( वेदानां देवता ) सब वेदों का
देवता [ प्रकाश्य विषय ] ( ओंकारः ) ओंकार है ५, ॥ २५ ॥
भावार्थः--मनुष्य को चाहिये कि ज्ञान पूर्वक ओंकार का विविध प्रकार ध्यान
करके आत्म शक्ति बढ़ाकर सदा उन्नति करे ॥ २५ ॥
कण्डिका २६ ।
को धातुरित्यापृधातुरवतिमप्येके रूपसामान्यादर्थसामान्यन्नेदीयस्तस्मा-
दापेरोङ्कारः सर्वमाप्नोतीत्यर्थः कृदन्तमर्थवत् प्रातिपदिकमदर्शनं प्रत्ययस्य नाम
सम्पद्यते निपातेषु चैनं वैयाकरणा उदात्तं समामनन्ति तदव्ययीभूत मन्वर्थवाची
शब्दो न व्येति कदाचनेति ।
सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥
को विकारी च्यवते प्रसारणमाप्नोति रावावपकारौ २ विकार्यावादित
ओङ्कारो विक्रियते द्वितीयो मकार एवं द्विवर्ण एकाक्षर ओमित्योङ्कारो
निर्वृत्तः ॥ २६ ॥
कण्डिका २६॥ कण्डिका २४ के ओम् विषयक प्रश्नों के उत्तर ।
( कः धातुः इति ) कौन धातु है-[ इसका उत्तर ] ( आप्तुः धातुः अवतिम्
आदाने--तव्यत् । ग्राह्यः ( गोत्रः ) गो + त्रैङ् पालने-कः । भूमिरक्षकः ( पुंसः १ )
पुंस अभिवर्धने--अच् । अभिवर्धकः ( वत्सः ) वृतृवदिवचिवसि० ( उ० ३ । ६२ )
वस निवासे--सः । निवासयिता ( रुद्रः ) रु गतौ--क्विप्, तुक् + रा दाने--कः
ज्ञानदाता ( देवता ) प्रकाश्यविषयः । ( ओंकारः ) ओंकारस्य ( वेदानाम् )
वेदानां मध्ये ॥
१. यहाँ "पुमान् पुरुमना भवति । पुंसतेर्वा" ( निरु० ६ । १५ ) अर्थात् [ स्त्री की
अपेक्षा ] बहुत उदार होता है, या पुरुषार्थी होता है, ऐसी व्युत्पत्ति निरुक्त की है। इसी
प्रकार रुद्र के लिये निरुक्त १० । ५ देखें । सम्पा० ॥
२. भ्रष्टोऽयं पाठः । "आपाववकारौ" एष युक्तः पाठः प्रतीयते, तदनुसारी चार्थः संशोध्य
प्रकाश्यते । जर्मनसंस्करणे तु "आप्नोतेराकारपकारौ" इति पाठः स चापि युक्तः । सम्पा० ॥