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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 600 में से

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पृष्ठ 587

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६। क० १६ ५४६
[ उसकी] शान्ति युक्त समर्थ प्रजायें [वैरी को] हराती हैं, जहां ऐसे ज्ञान को वह बोलता
है, जहां ऐसे ज्ञान को वह बोलता है--यह ब्राह्मण [ब्रह्मज्ञान] है [द्विरावृत्ति ग्रन्थ
समाप्ति सूचक है] ॥ १६ ॥
भावार्थ:-जो चतुर मनुष्य समझ बूझ कर शुभ कामों को अन्त तक पहुँचाते हैं
वे शत्रुओं को हटाकर प्रजा को सुखी करके यश पाते हैं ॥ १६ ॥
विशेष: १--इस कण्डिका को ऐतरेय ब्राह्मण ६। ३६ और ६। २६ से
मिलाओ ॥
विशेष: २-प्रतीक वाले एक एक मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं, शेष मन्त्र वेद
में देखो ॥
१, दाधिक्री ऋचा-(दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः ।
सुरभि नो मुखा करत् प्रण आयूंषि तारिषत्-अथ० २० । १३७ । ३) । (दधि-
क्राव्णः) चढ़ा कर चलने वाले वा हींसने वाले, (जिष्णोः) जीतने वाले, (वाजिनः)
वेग वाले (अश्वस्य) घोड़े के (अकारिषम्) कर्म को मैंने किया है। वह [कर्म]
(नः) हमारे (मुखा) मुखों को (सुरभि) ऐश्वर्य युक्त (करत्) करे और (नः)
हमारे (आयूंषि) जीवनों को (प्र तारिषत्) बढ़ावे ॥
२, पावमानी तृच-(सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः । पवित्र-
वन्तो अक्षारन् देवान् गच्छन्तु वो मदाः-अथ० २० । १३७ । ४-६, ऋ० ६ । १०१ ।
४-६, साम० उ० २ । २ । तृच १५) । (सुतासः) निचोड़े हुये, (मधुमत्तमाः)
अत्यन्त ज्ञान करने वाले, (मन्दिनः) आनन्द देने वाले, (पवित्रवन्तः) शुद्ध व्यवहार
वाले (सोमाः) सोम [तत्त्वरस] (इन्द्राय) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाले पुरुष] के लिए
(अक्षरन्) बहे हैं, (मदाः) वे आनन्द देने वाले [तत्त्व रस] (वः) तुम (देवान्)
विद्वानों को (गच्छन्तु) पहुँचें ॥
३, ऐन्द्राबार्हस्पत्य तृच-(अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो
दशभिः सहस्रैः । आवत् तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त- अथ०
२० । १३७ । ७-६, ऋ० ८ । ९६ [ सायण भाष्य ८५ ] । १३-१५, साम० पू०
४ । ४ । १) । (द्रप्सः) घमंडी, (कृष्णः) कौवा [के समान निन्दित लुटेरा शत्रु]
(दशभिः सहस्रैः) दस सहस्र [बड़ी सेना] के साथ (इयानः) चलता हुआ (अंशु-
मतीम्) विभाग वाली [सीमा वाली नदी] पर (अव-अतिष्ठत्) ठहरा है।