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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 569, कुल 600 में से

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पृष्ठ 569

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १२ ॥ ५३१
२-( अपेन्द्र प्राचो मघवन्नमित्रानपाचो अभिभूते नुदस्व । अपोदीचो अप
शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन् मदेम ॥ १ ॥ अ० २० । १२५ । १-७, ऋ० १० ।
१३१ । १-७ । ) यह मन्त्र आ चुका है-गो० उ० ६ । ४ ॥
३-वृषाकपि सूक्त-वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत । यत्रामदद् वृषा-
कपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥ १ ॥ अ० २० । १२६ । १-२३, ऋ०
१० । ८६ । १-२३ ॥ ( हि ) क्योंकि (सोतोः) तत्त्वरस का निकलना (वि असृक्षत )
उन्होंने [ लोगों ने ] छोड़ दिया है, [ इसी से ] ( देवम् ) विद्वान् ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ बड़े
ऐश्वर्य वाले मनुष्य आत्मा ] को ( न ) ( अमंसत ) उन्होंने नहीं जाना, ( यत्र ) जहां
[ संसार में ] ( अर्यः ) स्वामी ( मत्सखा ) मेरा [ देह वाले का ] साथी ( वृषाकपिः )
वृषाकपि [ बलवान् कपाने वाले अर्थात् चेष्टा कराने वाले जीवात्मा ] ने (पुष्टेषु )
पुष्टिकारक धनों में ( अमदत् ) आनन्द पाया है, ( इन्द्रः ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाला
मनुष्य ] ( विश्वस्मात् ) सब [ प्राणीमात्र ] से ( उत्तरः ) उत्तम है ॥
४-कुन्ताप सूक्त-इदं जना उप श्रुत नराशंस स्तविष्यते । षष्टिं सहस्रा
नवतिं च कौरम आ रुशमेषु दद्महे ॥ १ ॥ अ० २० । १२७ । १-१४, कुन्ताप सूक्त-
( जनाः ) हे मनुष्यो ! ( इदं ) यह ( उप ) आदर से ( श्रुत ) सुनो, [ कि ] ( नराशंसः )
मनुष्यों में प्रशंसा वाला पुरुष ( स्तविष्यते ) बड़ाई किया जावेगा । ( कौरम ) हे पृथिवी
पर मरण करने वाले राजन् ! ( षष्टिम् सहस्रा ) साठ सहस्र ( च ) और (नवतिम् ) नब्बे
[ अर्थात् अनेक दानों ] को ( रुशमेषु ) हिंसकों के फेंकने वालों के बीच ( आ दद्महे )
हम पाते हैं ॥
५-रैभी ऋचायें-वच्यस्व रेभ वच्यस्व वृक्षे न पक्वे शकुनः । नष्टे जिह्वा
चर्चरीति क्षुरो न भुरिजोरिव ॥४॥ अ० २० । १२७ । ४--६ ॥ ( रेभ ) हे विद्वान् !
( वच्यस्व ) उपदेश कर, ( न ) जैसे ( शकुनः ) पक्षी ( पक्वे ) फल वाले ( वृक्षे )
वृक्ष पर [ चहचहाता है ] । ( नष्टे ) दुष्ट व्यारने पर ( भुरिजोः ) दोनों धारण पोषण
करने वाले [ स्त्री पुरुष ] की ( इव ) ही ( जिह्वा ) जीभ ( चर्चरीति ) चलती रहती है,
( न ) जैसे ( क्षुरः ) छुरा [ केशों पर चलता है ] ॥
६-पारिक्षिती ऋचायें-राज्ञो विश्वजनीनस्य यो देवो मर्त्याँ अति । वैश्वा-
नरस्य सुष्टुतिमा सुनोता परिक्षितः ॥ अ० २० । १२७ । ७-१० ॥ ( यः ) जो ( देवः )
देव [ विजय चाहने वाला पुरुष ] ( मर्त्यान् अति ) मनुष्यों में बढ़कर [ गुणी है ]
( विश्वजनीनस्य ) सब लोगों के हितकारी, ( वैश्वानरस्य ) सबके नेता, ( परिक्षितः )
सब प्रकार ऐश्वर्य वाले ( राजः ) उस राजा की ( सुष्टुतिम् ) उत्तम स्तुति को (आ)
भले प्रकार ( सुनोत ) सुनो ॥
७-कारव्या ऋचायें-इन्द्रः कारूमबूझुदत्तिष्ठ वि चरा जनम् । ममेदमुग्रस्य
चर्कृधि सर्व इत् ते पृणादरिः ॥ अ० २० । १२७ । ११ ॥ ( इन्द्रः ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य
वाले पुरुष ] ने ( कारुम् ) काम करने वाले को ( अबूबुधत् ) जगाया है- (उत्तिष्ठ)
उठ और ( जनम् ) लोगों में ( वि चर ) विचर, ( मम इत उग्रस्य ) मुझ ही तेजस्वी की