सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 566

३२८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १२ ॥
बले निदधाति ) अन्न ही न्‍यूह है, और बल निनदं है, खाने योग्य अन्न को ही इस
[ यजमान ] के लिये उससे वह बल में स्थापित करता है ॥
४-( अथ कुन्तापं शंसति ) फिर वह कुन्ताप सूक्त [अथर्व० २० । १२७-१३६]
को बोलता है । ( कुयं ह वै नाम कुत्सितं भवति, तत् यत् तपति तस्मात् कुन्तापाः,
तत कुन्तापानां कुन्तापत्वम् ) कुय, यह कुत्सित [ निन्दित ] का नाम है क्योंकि वह
उसे तपाता है, इसलिये वे कुन्ताप [ पाप के भस्म करने वाले ] हैं, वह ही कुन्तापों का
कुन्तापत्व [ पापनाशक व्यवहार ] है । ( अस्मै कुयान् [ = कुयाः ] तप्यन्ते इति,
तप्तकुयः स्वर्गे लोके प्रतितिष्ठति ) इस [ यजमान ] के लिये पाप भस्म किये जाते हैं,
इसलिये पाप किया हुआ वह स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठा पाता है । ( प्रजया पशुभिः
प्रतितिष्ठति यः एव वेद ) प्रजा से और पशुओं से वह प्रतिष्ठा पाता है, जो ऐसा विद्वान्
है । ( तस्य चतुर्दश प्रथमाः भवन्ति, इदं जना उपश्रुत इति ) उस [ कुन्ताप ] के
चौदह पहिले मन्त्र हैं-इदं जना उपश्रुत......अथर्व० २० । १२७ । १-१४, यह ऋचायें
हैं । ( ताः प्रग्राहं शंसति, यथा वृषाकपिम् ) उन [ ऋचाओं ] को पाद पाद ग्रहण
करके और ठहर कर वह बोलता है जैसे वृषाकपि सूक्त को । ( वार्षरूपं हि वृषाकपेः )
वृष्टि वाला रूप ही वृषाकपि का है । ( तत् न्यायम् इति एव ) सो वह ठीक ही है ॥
५-( अथ रैभीः शंसति, वच्यस्व रेभ वच्यस्व-इति ) फिर रेभ शब्द वाली
ऋचाओं को वह बोलता है-वच्यस्व रेभ वच्यस्व......अथर्व० २० । १२७ । ४-६, यह
ऋचायें हैं । ( रेभन्तः वै देवाः च ऋषयः च स्वर्गं लोकम् आयन् ) रेभ [ स्तुति ]
करते हुये ही देवों [ विद्वानों ] और ऋषियों [ सन्मार्गदर्शकों ] ने स्वर्ग लोक पाया है ।
( तथा एव एतत् यजमानाः रेभन्तः एव स्वर्गं लोकं यन्ति ) वैसे ही इस [ विधान ]
से यजमान रेभ [ स्तुति ] करते हुये ही स्वर्ग लोक पाते हैं । ( ताः प्रग्राहम् इति एव )
इन [ ऋचाओं ] को पाद पाद ग्रहण करके और ठहर कर [ वह बोलता है ], यह ही
विधान है ॥
६-( अथ पारिक्षितीः शंसति, राज्ञः विश्वजनीनस्य इति ) फिर परिक्षित्
शब्द वाली ऋचायें वह बोलता है, राज्ञो विश्वजनीनस्य......अथर्व० २० । १२७ । ७-१०
यह ऋचायें है । ( संवत्सरः वै परिक्षित्, संवत्सरः हि इदं सर्वं परिक्षियति
यद्वा कुयं कुत्सितं + तप दाहे-घञ् । पापस्य दुःखस्य तापकं दाहकम् ( तप्त-
कुयः ) भस्मीकृतपापः ( प्रग्राहम् ) पादे पादे प्रगृह्य अवसाय च ( न्यायम् )
न्याय्यम् । उचितम् ( रैभीः ) रेभशब्दयुक्ताः ( वच्यस्व ) ब्रवीतेर्यङ् । ब्रूहि ।
उपदिश ( रेभ ) रेभतिरर्चतिकर्मा-निघ० ३ । १४ । अच् । हे स्तोतः । हे विद्वन्
( रेभन्तः ) स्तुवन्तः ( पारिक्षितीः ) परिक्षित् इति शब्दयुक्ताः ( परिक्षित् ) परि
+क्षि निवासे ऐश्वर्ये च--क्विप्, तुक् । सर्वतो निवासकः ( कारव्याः ) कारु-
शब्दयुक्ताः ( राज्ञः ) शासकस्य ( परिक्षितः ) सर्वत ऐश्वर्ययुक्तस्य ( विश्व-
जनीनस्य ) आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात् खः `( पा० ५ । १ । ९६ ) विश्वंजन--