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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 554, कुल 600 में से

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पृष्ठ 554

५१६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० ८
हैं, अतिमशं [ मन्त्रों के अत्यन्त संयोग ] को ही वह बोले- (तथा वै प्रगाथाः कल्पयन्ते )
इस प्रकार से ही वे प्रगाथाओं को मानते हैं । ( यत् एव अतिमर्शम्, तत् स्वर्गस्य लोकस्य
रूपम् ) जो ही अतिमर्श [ मन्त्रों का मिलान ] है, वह स्वर्गलोक का रूप है । ( यत् उ एव
अतिमशंम्, आत्मा वै बृहती, प्राणाः सतोबृहती ) जो ही अतिमर्श [ मिलान ] हैं, आत्मा
ही बृहती छन्द है और प्राण सतोबृहती छन्द हैं । ( सः बृहतीम् अशंसीत्, सः आत्मा, अथ
सतोबृहतीम्, ते प्राणाः अथ बृहतीम् अथ सतोबृहतीं तत् आत्मानं प्राणैः परिवृहन् एति)
[ जो ] वह बृहती छन्द बोलता है, वह आत्मा है, फिर सतोबृहती छन्द को, वे प्राण हैं,
फिर बृहती फिर सतोबृहती को [ बोलता है ], उससे आत्मा को प्राणों के साथ बढ़ाता
हुआ वह चलता है । (यत् उ एव अतिमशंम्, आत्मा वै बृहती, प्रजाः सतोबृहती) क्योंकि
यह ही अतिमर्श [मिलान] है, आत्मा ही बृहती है, और प्रजायें सतोबृहती । ( सः बृहतीम्
अशंसीत् सः आत्मा, अथ सतोबृहतीं, ते [=ताः], प्रजाः, अथ बृहतीम् अथ सतोबृहतीं
तत् आत्मानं प्रजया परिवृहन् एति) वह जो बृहती को बोलता है वह आत्मा है, फिर जो
सतोबृहती को, वे प्रजायें हैं, फिर जो बृहती को फिर सतोबृहती को [ मिला कर बोलता
है ], उस से आत्मा को प्रजा के साथ बढ़ाता हुआ वह चलता है । ( यत् उ एव अति-
मशंम्, आत्मा वै बृहती, पशवः सतोबृहती ) क्योंकि यह भी अतिमर्श [ अत्यन्त विचार ]
है—आत्मा ही बृहती है और पशु सतोबृहती हैं । ( सः बृहतीम् अशंसीत् सः आत्मा,
अथ सतोबृहतीम्, ते पशवः, अथ बृहतीम् अथ सतोबृहतीं, तत् आत्मानं पशुभिः
परिवृहन् एति ) [ जो ] वह बृहती छन्द बोलता है वह आत्मा है फिर सतोबृहती को, वे
सब पशु हैं, फिर बृहती को फिर सतोबृहती को [ बोलता है ], उससे आत्मा को पशुओं
के साथ बढ़ाता हुआ वह चलता है ॥
( मैत्रावरुणः तस्य प्राणान् कल्पयित्वा ब्राह्मणाच्छंसिने सम्प्रयच्छति-त्वम्
एतस्य प्रजनय इति ) मैत्रावरुण इस [ यजमान ] के प्राणों को समर्थ करके [ उसे ]
ब्राह्मणाच्छंसी को देता है—तू इस का उत्तम जन्म कर । ( सुकीर्त्तिं शंसति, देवयोनिः
वै सुकीर्त्तिः, तत् यज्ञियायां देवयोन्यां यजमानं प्रजनयति ) वह [ ब्राह्मणाच्छंसी ] सुकीर्ति
[ सुकीर्ति ऋषि के देखे हुये सूक्त—अप प्राच इन्द्र विश्वां—ऋ० १० । १३१ । १-७ ] को
बोलता है, देवों [ दिव्य गुणों ] की उत्पत्ति स्थान सुकीर्त्ति [ उत्तम बड़ाई ] है, तब पूजनीय
दिव्य गुणों की उत्पत्ति स्थान में यजमान को उत्तम जन्म देता है । ( वृषाकपिं शंसति,
आत्मा वै वृषाकपिः अस्य आत्मानम् एव तत् कल्पयति ) वृषाकपि [ वृषाकपि के देखे
सूक्त—क० ७ ] को वह बोलता है आत्मा ही वृषाकपि [ बलवान् चेष्टा कराने वाला ] है,
उस के आत्मा को ही तब वह समर्थ करता है । (तं न्यूह्नयति ) उस [ वृषाकपि
सूक्त ] को न्यूह्न युक्त करता है [ क० १ ] । ( अन्नं वै न्यूह्नः, अन्नाद्यम् एव अस्मै तत्
( कल्पयन्ते ) रचयन्ति ( अतिमशंम् ) संयोगम् ( परिवृहन् ) परिवर्धयन् ( एति )
गच्छति । प्रवर्तते ( सुकीर्त्तिम् ) सुकीर्तिनामकेन ऋषिणा दृष्टं सूक्तम्—
ऋ० १० । १३१ (तं न्यूह्नयति ) तं वृषाकपिं न्यूह्नयुक्तं करोति ( पाङ्क्तः)
पङ्क्तिविंशति० ( पा० ५ । १ । ५६ ) पञ्चन्—तिप्रत्ययः, टिलोपः, पङ्क्ति—