गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 541, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६। क० ४॥ ३०३
१६। १५। ४, यह मन्त्र अच्छावाक दिन दिन बोलता है। (अनु नेषि इति एतः इव
हि अहीनः, अहीनस्य रूपम्) अनु नेषि, [ तू निरन्तर ले चलता है ] इससे एतः [आया
हुआ ] ही अहीन यज्ञ है, [ इसलिये यह मन्त्र ] अहीन यज्ञ का रूप है। (नेषि इति
सत्रायणरूपम् ) नेषि [ तू ले चलता है ] यह सत्र यज्ञ के अनुष्ठान का रूप है। (एषाम्
ओकःसारी ह एव इन्द्रः भवति ) इन [ यजमानों ] के घरों में जाने वाला इन्द्र है।
( यथा गौः प्रज्ञातं गोष्ठं, यथा वासितायाः ऋषभम्, एवं ह एव इन्द्रः एषां यज्ञम्
आगच्छति ) जैसे गौ जाने हुये गोट में आती है, और जैसे निवास कराई हुई प्रजायें
उद्योगी पुरुष के पास [ आती हैं ], वैसे ही इन्द्र इन [ यजमानों ] के यज्ञ में आता है।
(शुनं हुवेम यथा अहीनस्य न परिदध्यात्) शुनं हुवेम ॰ अथर्व० २० । ११ ।
११, इस पद वाली ऋचा से जिस प्रकार अहीन यज्ञ की परिधानीया [ समाप्ति विधि ] न
करे [ वैसा करे ] । (क्षत्रियः ह राष्ट्रात् च्यवंते, यः ह एव परः भवति, तम्
अभिह्वयति ) [ इस मन्त्र की परिधानीया से ] क्षत्रिय [ राजा ] राज्य से गिर जाता है,
[ क्योंकि ] जो ही [ इसका ] बैरी है, उस [ बैरी ] को [ इस परिधानीया से ] वह
बुलाता है ॥ ४॥
भावार्थ :-कण्डिका १ के समान है ॥ ४ ॥
विशेषः १—इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ६ । २२ से मिलाओ ॥
विशेषः २—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१—अपेन्द्र प्राचो मघवन्नमित्रानपाचो अभिभूते नुदस्व । अपोदीचो अप
शूराधराच उरो यथा तव शर्मन् मदेम-अथर्व० २० । २५ । १, ऋ० १० । १३१ ।
१ भेद से ॥ ( मघवन् ) हे महाधनी ! (अभिभूते ) हे विजयी ! ( शूर ) हे शूर !
( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले राजन् ] ( प्राचः ) पूर्व वाले ( अमित्रान् )
बैरियों को ( अप ) दूर, (अपाचः) पश्चिम वाले [ बैरियों ] को (अप) दूर, (उदीचः)
उत्तर वाले [ बैरियों ] को ( अप ) दूर, और ( अधराचः ) दक्षिण वाले [ बैरियों ] को
( अप ) दूर, नुदस्व) हटा, ( यथा ) जिससे ( तव ) तेरी ( उरो ) चौड़ी ( शर्मन् )
शरण में ( मदेम ) हम आनन्द करें ॥
२—ब्रह्मणा ते ब्रह्मयुजा युनज्मि हरी सखाया सधमाद आशु । स्थिरं रथं
सुखमिन्द्राधितिष्ठन् प्रजानन् विद्वां उप याहि सोमम्-अथर्व० २० । ८६ । १,
ऋ० ३ । ३५ । ४ ॥ ( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले मनुष्य ] ( ते ) तेरे लिए
( ब्रह्मणा ) अन्न के साथ (ब्रह्मयुजा ) धन के संग्रह करने वाले, ( आशु ) शीघ्र चलने
( अनु ) निरन्तरम् (नेषि) शपो लुक् । नयसि । नय (एतः) आ + इण् गतो-क्तः ।
प्रवृत्तः (सत्रायणरूपम्) सत्रस्य यज्ञविशेषस्य अयनस्य अनुष्ठानस्य रूपम् (ओकः-
सारी) गृहगामी (वासितायाः) गो० उ० ५ । १५ । प्रथमाथॆ षष्ठी । वासिता ।
निवासिता प्रजा (शुनम् ) सुखप्रदम् । शुनं इति पदयुक्तया ऋचा ( परिदध्यात् )
परिधानीयां समाप्तिविधिं कुर्यात् ( परः ) शत्रुः ( अभिह्वयति ) आह्वयति ॥