गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 536, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४९८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० २
( अद्य ) आज ( कः ) कौन ( नर्य्यः ) नरों [ नेताओं ] में श्रेष्ठ, ( देवकामः ) विद्वानों
को चाहने वाला और ( इन्द्रस्य ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले पुरुष ] की ( सख्यम् ) मित्रता
की ( उशन् ) कामना करता हुआ [ मनुष्य ] ( जुजोष ) सेवा करता है । ( वा ) अथवा
( कः ) कौन ( समिद्धे ) प्रज्वलित ( अग्नौ ) अग्नि में ( सुतसोमः ) सोम [ तत्त्वरस ]
निचोड़ता हुआ [ मनुष्य ] (महे ) बड़े ( पार्याय ) पार लगाने वाले ( अवसे )
रक्षणादि कर्म के लिये ( ईट्टे ) ऐश्वर्य्यवान् होता है ॥ [ शेष मन्त्र वेद में देखो ] ॥
२-वने न वा यो न्यधायि चाकञ्छुचिर्वा स्तोमो भुरणावजीगः । यस्येदिन्द्रः
पुरुदिनेषु होता नृणां नर्यो नृतमः क्षपावान्-ऋ० १० । २६ । १-८, वसुक ऋषि,
अथर्व० २० । ९६ । १-८ ॥ ( वने ) वृक्ष पर ( न ) जैसे ( चाकन् ) प्रीति करने वाला
( वा, यः = वायः ) पक्षी का बच्चा ( नि अधायि ) रखा जाता है, [ वैसे ही ]
( भुरणौ ) हे दोनों पोषको ! [ माता पिताओ ] ( शुचिः ) पवित्र ( स्तोमः ) बड़ाई
योग्य गुण ने ( वाम् ) तुम दोनों को ( अजीगः ) ग्रहण किया है। ( यस्य ) जिस
[ बड़ाई योग्य गुण ] का ( इत् ) ही ग्रहण करने वाला ( इन्द्रः ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाला
पुरुष ] ( पुरुदिनेषु ) बहुत दिनों के भीतर ( नृणाम् ) नेताओं का ( नृतमः ) सबसे
बड़ा नेता, ( नर्यः ) पुरुषों का हितकारी ( क्षपावान् ) श्रेष्ठ रात्रियों वाला है ॥ [ शेष
मन्त्र वेद में देखो ] ॥
३--आ याह्यर्वाङ्क बन्धुरेष्ठास्तवेदतु प्रदिवः सोमपेयम् । प्रिया सखाया
वि मुचोप बर्हिस्त्वामिमे हव्यवाहो हवन्ते-ऋ० ३ । ४३ । १--८ विश्वामित्र
ऋषि ॥ [ हे इन्द्र राजन् ] ( बन्धुरेष्ठाः ) बन्धनों वाले वा सुन्दर रथ में बैठा हुआ तू
( अर्वाङ् ) सामने ( उप आ याहि ) समीप आ, ( प्रदिवः तव ) उत्तम प्रकाश वाले
तेरे ( इत् ) ही ( सोमपेयम् अनु ) सोम [ तत्त्व वा ओषधियों के रस ] पीने के लिये
( प्रिया सखाया ) दो प्रिय मित्र [ अध्यापक और उपदेशक वर्त्तमान हैं ], ( बर्हिः )
ऊंचे आसन को ( वि मुचं ) छोड़ दे, ( इमे ) यह ( हव्यवाहः ) देने लेने योग्य पदार्थ
लाने वाले लोग ( त्वाम् ) तुझको ( उप ह्वन्ते ) आदर से बुलाते है ॥ [ शेष मन्त्र
वेद में देखो ] ॥
४--सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः प्रभर्त्तुमावदन्धसः सुतस्य । साध्योः
पिब प्रतिकामं यथा ते रसाशिरः प्रथमं सोम्यस्य--ऋ० ३ । ४८ । १--५, विश्वा-
मित्र ऋषि ॥ यह मन्त्र आ चुका है- गो० उ० ४ । १ तथा ६ । १ । शेष मन्त्र वेद
में देखो ॥
५--सं वां कर्मणा समिषा हिनोमीन्द्राविष्णू अपसस्पारे अस्य । जुषेथां
यज्ञं द्रविणं च धत्तमरिष्टैर्नैः पथिभिः पारयन्ता-ऋ० ६ । ६९ । १-८ ॥ भर-
द्वाज बृहस्पति का पुत्र ऋषि ॥ यह मन्त्र आ चुका है गो० उ० ४ । १७ शेष मन्त्र वेद में देखो ॥
६-उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्येन्द्रं समर्ये महया वसिष्ठ । आ यो विश्वानि
शवसा ततानोप श्रोता म ईवतो वचांसि-ऋ० ७ । ९३ । १-६, वसिष्ठ ऋषि ॥
यह मन्त्र आ चुका है गो० उ० ४ । १ तथा ६ । १ ॥ शेष मन्त्र वेद में देखो ॥