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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 600 में से

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पृष्ठ 526

४८८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० १५
भावार्थः--ऋत्विज् लोग समय के अनुकूल मन्त्रों से देवताओं का आवाहन
करें ॥ १५ ॥
विशेषः १--इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ६ । १७, । ६ । १८ से मिलाओ ॥
विशेषः २-प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ।
१-आ सत्यो यातु मघवाँ ऋजीषी द्रवन्त्वस्य हरय उप नः । तस्मा
इदन्धः सुषुमा सुदक्षमभिपित्वं करते गृणानः-अथर्व० २० । ७७ । १-८,
ऋ० ४ । १६ । १--८ ॥ (सत्यः) सच्चा [सत्यवादी, सत्यकर्मी] . (मघवान्) महा-
धनी, (ऋजीषी) सरल स्वभाव वाला [राजा] (आ यातु) आवे और (अस्य) इस
[राजा] के (हरयः) मनुष्य (नः) हमारे (उप द्रवन्तु) पास आवें । (तस्मै) उस-
के लिये (इत्) ही (सुदक्षम्) सुन्दर बल वाला (अन्धः) अन्न (सुषुम) हमने सिद्ध
किया है, (गृणानः) उपदेश करता हुआ वह (इह) यहाँ (अभिपित्वम्) मेल मिलाप
(करते) करे ॥ [सूक्त में आठ मन्त्र हैं, शेष के लिये वेद देखो ] ॥
२--अस्मा इदु प्र तवसे तुराय प्रयो न हर्मि स्तोमं महिनाय । ऋची-
षमायाधिगव ओहमिन्द्राय ब्रह्माणि राततमा-अथर्व० २० । ३५ । १--१६ ऋ०
१ । ६१ । १--१६ ॥ (अस्मै) इस [संसार] के हित के लिए (इत्) ही (उ)
विचार पूर्वक (तवसे) बल के निमित्त, (तुराय) फुर्तीले (महिनाय) पूजनीय,
(ऋचीषमाय) स्तुति के समान गुण वाले, (अधिगवे) बे रोग गति वाले, (इन्द्राय)
इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाले सभापति] के लिए (स्तोमम्) स्तुति को (ओहम्) पूरे
विचार को और (राततमा) अत्यन्त देने योग्य (ब्रह्माणि) धनों को (प्रयः न) तृप्ति
करने वाले अन्न के समान (प्र हर्मि) मैं आगे लाता हूँ [सूक्त में १६ मन्त्र हैं, शेष के
लिए वेद देखो ] ॥
३--शासद् वह्निर्दुहितुर्नप्त्यं गाद् विद्वाँ ऋतस्य दीधितिं सपर्यन् । पिता
यत्र दुहितुः सेकम्ऋञ्जन्त्सं शग्म्येन मनसा दधन्वे--ऋ० ३ । ३१ । १--२२ ॥
(विद्वान्) जानकार (वह्निः) वह्नि [घर का चलाने वाला पिता] (ऋतस्य) सत्य
नियम के (दीधितिम्) धारण करने वाले [जामाता] को (शासत्) शिक्षा देता हुआ
और (सपर्यन्) पूजता हुआ (दुहितुः) पुत्री से (नप्त्यम्) नाती [नाती के समान
दोहते] को (गात्) पाता है, (यत्र) जहाँ [गृहस्थ व्यवहार में] (दुहितुः) पुत्री
के (सेकम्) सेचन [सींचे हुए पुत्र] को (ऋञ्जन्) समर्थ पाता हुआ (पिता) वह
पिता (शग्म्येन) सुखी (मनसा) मन के साथ (सं दधन्वे) संगत होता है, [अर्थात्
पुत्रहीन पिता बेटी से दोहते को लेकर नाती के समान अपना दायभागी करता और सुखी
होता है ॥ यह मन्त्र निरु० ३ । ४ और ५ में व्याख्यात है । सूक्त में २२ मन्त्र हैं, शेष के
लिए वेद देखो ] ॥
इति श्रीमद्राजाधिराज-प्रथितमहागुणमहिम-श्रीसयाजीराव-गायकवाड।-
धिष्ठित-बड़ोदेपुरीगत-श्रावणमासदक्षिणापरीक्षायाम् ऋक्सामार्थववेदभाष्येषु