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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 600 में से

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पृष्ठ 427

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १४ ॥ ३८१
२—प्र मित्रयोर्वरुणयोः स्तोमो न एतु शूष्यः । नमस्वान् तुविजातयोः—ऋग्०
७ । ६६ । १५ ॥ (तुविजातयोः) बहुत प्रसिद्ध (मित्रयोः, वरुणयोः) मित्र और वरुण
[हितकारक और श्रेष्ठ आचरण वाले] दोनों को (नः) हमारा (शूष्यः) सुख देने वाला
और (नमस्वान्) उत्तम अन्नों वाला (स्तोमः) स्तुति योग्य व्यवहार (प्र एतु) अच्छे
प्रकार प्राप्त हो ॥
३—आ यातं मित्रावरुणा जुषाणावाहूतिं नरा। पातं सोममृतावृधा—ऋग्०
७ । ६६ । १६ ॥ (नरा) हे दोनों नरो ! [नेताओं] (मित्रावरुणा) मित्र और वरुण !
[हितकारक और उत्तम आचरण वाले पुरुषों] (आहुतिम्) आहुति [भेंट] को
(जुषाणौ) सेवन करते हुये (आ यातम्) आओ, (ऋतावृधा) हे सत्य नियम बढ़ाने
वाले दोनों (सोमम्) सोम [तत्त्व रस] की (पातम्) रक्षा करो ॥
कण्डिका १४ ॥
इन्द्रमब्रवीत्, त्वं न इमं यज्ञस्याङ्गमनुसमाहर¹ ब्राह्मणाच्छंसीयाम्। केन
सहेति। सूर्य्येणेति। तथेत्यब्रूताम्। तौ सयुजौ सबलौ भूत्वा प्रासहा मृत्युमत्यैताम्।
तौ ह्यस्यैतद्यज्ञस्याङ्गमनुसमाहरतां ब्राह्मणाच्छंसीयाम्। तस्माद् ब्राह्मणाच्छंसी
प्रातःसवन ऐन्द्राणि सूर्य्याण्यङ्गानि शंसति। तौ ह्यस्यैतद्यज्ञस्याङ्गमनुसमाहरताम्।
यद्वेव ऐन्द्राणि सूर्य्याण्यङ्गानि शंसति, इन्द्र पिब प्रतिकामं सुतस्य प्रातःसावस्तव हि
पूर्वपीतिरिति ऋचाभ्यनूक्तम्। आ याहि सुषुमा हि त आ नो याहि सुतावत इति
ब्राह्मणाच्छंसिन स्तोत्रियानुरूपौ। अयमु त्वा विचर्षण इति उक्थमुखम्। उद्
घेदभिश्रुतामघमिति पर्य्यासः। इन्द्र ऋतुविदमिति यजति। एते एव तद् देवते यथाभागं
प्रीणाति, वषट्कृत्यानुवषट् करोति। प्रत्येवाभिमृशन्ते, नाप्याययन्ति न ह्वानाराशंस्याः
सीदन्ति ॥ १४ ॥
कण्डिका १४ ॥ प्रातः सवन में ब्राह्मणाच्छंसी द्वारा इन्द्र॑ और
सूर्य की स्तुति ॥
(इन्द्रम् अब्रवीत्, त्वं नः यज्ञस्य इमम् अङ्गं ब्राह्मणाच्छंसीयाम् अनुसमाहर)
वह [यजमान] इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाले पुरुष] के विषय में [ब्रह्मा और होता से]
बोला—तू [तुम दोनों] हमारे यज्ञ के इस अङ्ग को ब्राह्मणाच्छंसी [वेद से स्तुति करने
वाले ऋत्विज्] वाली [स्तुति] से अनुकूलता के साथ समाप्त करो। (केन सह इति)
[वे बोले] किसके साथ। (सूर्येण इति) [यजमान बोला] सूर्य [प्रेरणा करने वाले
वा सूर्य के समान प्रतापी पुरुष] के साथ। (तथा इति अब्रूताम्) वे दोनों [ब्रह्मा और
होता] बोले—ऐसा ही हो। (तौ सयुजौ सबलौ प्रासहा भूत्वा मृत्युम् अति ऐताम्)
और वे दोनों [इन्द्र और सूर्य] समान योग [मेल] वाले, समान बल वाले और विजयी
१४—(इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं पुरुषम् (त्वम्) युवाम् (अनुसमाहर)
१. पू. सं. 'समाहरन्' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥