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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 600 में से

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पृष्ठ 422

३८४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ११
का प्रणव [ओम्] शुद्ध मकारान्त है, और प्रतिष्ठा चाहने वालों का प्रणव मकारान्त है—ऐसा
कोई कोई कहते हैं । ( शुद्धः प्रणवः इति तु एव स्थितः मीमांसितः ) प्रणव शुद्ध है—यह
जो स्थिर तत्त्व से निर्णय किया हुआ [ सिद्धान्त ] है । ( अथ अतः इह शुद्धः इह पूर्णः
इति शुद्धः प्रणवः शस्त्रानुवचनयोः मध्ये स्यात् इति ह स्म कौषीतकिः आह ) फिर इस
कारण से कि—वह यहाँ शुद्ध है, वह यहाँ पूर्ण है—वह शुद्ध प्रणव दोनों स्तोत्र और व्याख्यान
के बीच में है—ऐसा कौषीतकि [ तत्त्व परीक्षक का पुत्र ऋषि ] कहता है । ( तथा संहितं
भवति मकारान्तः अवसानार्थे ) इस प्रकार से यह संगत होता है—मकारान्त [ ओम् ]
सीमा वा ठहराव के लिये है। ( प्रतिष्ठा वै अवसानं प्रतिष्ठित्थै एव ) प्रतिष्ठा [ठहराव]
ही सीमा है, वह [ ओम् ] प्रतिष्ठा के लिये ही है । ( अथ उभयोः कामयोः आप्त्यै एतौ
वै छन्दःप्रवाहौ अरं छन्दः परं छन्दः अतिप्रवहतः ) फिर [ प्रजा और प्रतिष्ठा की ] दोनों
कामनाओं की प्राप्ति के लिये यह दोनों छन्द प्रवाह अरं छन्द और परं छन्द [ अर्थात्
पर्याप्त छन्द और श्रेष्ठ छन्द ] अत्यन्त करके बहते रहते हैं । ( तस्य आयुः न हिनस्ति,
छन्दसां छन्दः अतिप्रौढं स्यात् ) उस के आयु को वह नहीं नाश करता [ जिसका ]
छन्द [ वेद ज्ञान ] छन्दों के बीच अति पुष्ट होवे । ( यत्र एव यं द्विष्यात् तं मनसा एव
प्र विध्येत् ) जहां पर ही जिससे द्वेष करे, उसको मनन से ही छेद डाले । ( छन्दसां
क्रन्दत्रे वाचं द्रवति वा शीर्यते इति ) छन्दों के बोलने वाले के लिये वह [ शत्रु अपनी ]
वाणी पिघला देता है वा [ आप ] नष्ट हो जाता है । ( त्रिः प्रथमां त्रिः उत्तमाम्
अन्वाह तत् बर्हिसो यज्ञस्य एव स्थेम्ने बलाय अविस्त्रंसाय नह्यति ) वह तीन बार
पहिली [ ऋचा ] और तीन बार सबसे पिछली [ ऋचा ] पढ़ता है और उससे दो वृद्धि-
कारक व्यवहारों [ प्रजा कामना और प्रतिष्ठा कामना, अथवा दो कुशाओं ] को यज्ञ की
स्थिरता के लिये, बल के लिये और अविनाश के लिए नियत करता है । ( यद्यपि प्रात -
सवने अर्धर्चशः एव तस्य शंस्यं छन्दः गायत्र्याः रूपेण युज्येत, अथो प्रातःपवन-
रूपेण इति ) यद्यपि प्रातःसवन में आधी आधी ऋचाओं से ही उस का बोलने योग्य छन्द
गायत्री के रूप से बोला जावे और प्रातःसवन के रूप से भी । ( त्रिष्टुब्जगत्यौ एतस्मिन्
स्थाने अर्धर्चशस्ये न युज्येताम् यत् किञ्चित् छन्दः प्रातःसवने ) त्रिष्टुप् और जगती
छन्द इस स्थान पर आधी आधी ऋचाओं के बोलने में न बोले जावें, जो कुछ छन्द प्रातः-
सवन में [ होवे वह ही बोला जावे ] । ( पच्छः एव एनयोः शस्यम् इति सा


अविनाशि ब्रह्म ( मन्त्रेण ) विचारेण ( वंशेन ) तृणजातिभेदेन ( मीमांसितः ) तत्त्वेन
निर्णीतः ( शस्त्रानुवचनयोः ) स्तोत्रव्याख्यानयोः ( कौषीतकिः ) कुसेरुन्मोमेदेताः ( उ०
४ । १०६ ) कुष निष्कर्षे—इतः, स्वार्थे—कन् दीर्घश्च । कुषीतक—इञ् अपत्यार्थे ।
कुषीतकस्य तत्त्वनिष्कर्षकस्य पुत्रः । ऋषिविशेषः ( संहितम् ) संगतम् ( अवसानम् )
विरामः । सीमा ( अरम् ) अलम् । पर्याप्तम् ( परम् ) श्रेष्ठम् ( अतिप्रौढम् ) अति
प्रवृद्धम् ( क्रन्दत्रे ) कथयित्रे ( द्रवति ) रसीभूतां नग्ना करोति ( बर्हिसो ) वृद्धिभ्य-
हारौ । कुशौ ( स्थेम्ने ) स्थिर—इमनिच् । स्थिरतायै ( अविस्त्रंसाय ) अविध्वं-
साय .( अर्धर्चशः ) अर्धर्चप्रयोगेण ( शंस्यं, शस्यम् ) शंसु कथने—क्यप् ।