गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 401, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २ ॥ ३६३
प्रायश्चित्ताहुतीनां कामानां समर्धयित्रे सर्वान् नः कामान्त्समर्धय स्वाहा । इदमग्नये
स्विष्टकृते-इदं न मम ।। ( ओम् ) परमेश्वर । ( यत् ) जो कुछ ( अस्य कर्मणः )
इस कर्म में ( अति—अरीरिचम् ) मैंने अधिक किया है, ( यद्वा ) अथवा ( न्यूनम् ) न्यून
( इह ) इसमें ( अ·रम् ) मैंने किया है; ( तत् ) उसको ( सु-इष्ट-कृत् ) उत्तम मनोरथ
का सिद्धि करने वाला ( अग्निः ) परमेश्वर ( विद्यात् ) जाने, वह मेरे ( सर्वम् ) सब
( स्विष्टम् ) उत्तम मनोरथ को ( सु·हुतम् ) सुन्दर रीति से अङ्गीकार ( करोतु ) करे ।
( सु-इष्ट-कृते ) उत्तम मनोरथ के सिद्ध करने हारे, ( सु-हुत-हुते ) उत्तम दान के
दान करने हारे, ( सर्वप्रायश्चित्त-आहुतीनाम् ) सब पापनाशक तप की आहुतियों की
( कामानाम् ) उत्तम कामनाओं को ( समर्धयित्रे ) सिद्ध करने हारे ( अग्नये ) ज्ञान के
निमित्त ( नः ) हम सबकी ( सर्वान् ) सब ( कामान् ) उत्तम कामनाओं को ( समर्धय )
[ हे परमेश्वर ! ] तू सिद्ध कर । ( स्वाहा ) यह सुन्दर आहुति है । ( इदम् ) यह
[ आत्मसमर्पण ] ( सु-इष्ट-कृते ) उत्तम इष्ट के सिद्ध करने हारे ( अग्नये ) परमेश्वर के
लिये है—( इदम् न मम ) यह मेरे लिये नहीं है ।
कण्डिका २ ॥
वज्रो वै वषट्कारः । स यं द्विष्यात् तं मनसा ध्यायन् वषट् कुर्यात् ।
तस्मिंस्तद्वज्रमास्थापयति । षडिति वषट्करोति । षड्वा ऋतव ऋतूनामाप्त्यै ।
वौषडिति वषट् करोति । असौ वाव वौ, ऋतवः षट् एतमेव तदृतुष्वदधाति,
ऋतुषु प्रतिष्ठापयति । तदु ह स्माह, वैत एतानिव एतेन षट् प्रतिष्ठापयति ।
द्योरन्तरिक्षे प्रतिष्ठिता, अन्तरिक्षं पृथिव्यां, पृथिव्यप्सु आपः सत्ये¹, सत्यं ब्रह्मणि,
ब्रह्म तपसि । इत्येता एवं तद्देवताः प्रतिस्थान्याः² प्रतिष्ठन्तीरिदं सर्वमनु प्रति-
तिष्ठति । प्रतितिष्ठति प्रजया पशुभिः, य एवं वेद ॥ २ ॥
कण्डिका २ ।। वषट्कार वज्र, छह ऋतु और छह आकाश आदि हैं ।।
( वज्रः वै वषट्कारः ) वज्र रूप ही वषट्कार [ आहुति दान ] है । ( सः यं
द्विष्यात् तं मनसा ध्यायन् वषट् कुर्यात् ) वह [ यजमान ] जिसको वैरी जाने, उसको
मन से ध्यान करता हुआ वषट् [ आहुति दान ] करे । ( तस्मिन् तत् वज्रम्
आस्थापयति ) उस [ शत्रु ] में उससे वह वज्र स्थापित करता है । ( षट् इति वषट्
करोति ) षट् [छह, यह वषट् = व-षट्] शब्द को जताता है । ( षट् वै ऋतवः ऋतूनाम्
आप्त्यै ) षट् [ छह ] ही ऋतुयें हैं, ऋतुओं की प्राप्ति के लिये [ यह है ] । ( वौषट् इति
वषट् करोति ) वौषट् यह पद वषट्कार है । ( असौ वाव वौ, ऋतवः षट्, एतम् एव
तत् ऋतुषु आदधाति, ऋतुषु प्रतिष्ठापयति ) वह [ दिखाई देता हुआ सूर्य ] ही वौ
२—( वषट्-करोति ) वषट्कारं ज्ञापयति ( आप्त्यै ) प्राप्तये ( वौषट् ) वह
प्रापणे—डौषट् । वषट् । हविष्ट्यागः ( असौ ) दृश्यमानः सूर्यः ( वौ ) वह
१. पू. सं. “सत्येन” इति पाठः ॥ २. पूं. सं. ‘प्रतिष्ठान्याः’ इति पाठः ॥ सम्पा० ॥