गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३५८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० २२ ॥
ओर ( पीतये ) वृद्धि के लिए ( प्रति स्वसरम् ) प्रति दिन वा प्रति घर ( उप यातु )
आया करे ॥
३-इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पतेऽस्मिन् यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू । आ वां
विशन्त्विन्दवः स्वाभुवोऽस्मे रयिं सर्ववीरं नियच्छतम् -अथ० २० । १३ । १,
ऋ० ४ । ५० । १० ॥ ( बृहस्पते ) हे बृहस्पति ! [ बड़ी वेदवाणी के रक्षक विद्वान् ]
( च ) और ( इन्द्रः ) हे इन्द्र ! [ अत्यन्त ऐश्वर्य वाले राजन् ] ( मन्दसाना ) आनन्द
देने वाले, ( वृषण्वसू ) बलवान् वीरों को निवास कराने वाले तुम दोनों ( सोमम् ) सोम
[ उत्तम ओषधियों के रस ] को ( अस्मिन् यज्ञे ) इस यज्ञ [ राजपालन व्यवहार ] में
( पिबतम् ) पीओ । ( स्वाभुवः ) अच्छे प्रकार सब ओर होने वाले ( इन्दवः ) ऐश्वर्य
( वां ) तुम दोनों में ( आ विशन्तु ) प्रवेश करें, ( अस्मे ) हमको ( सर्ववीरम् ) सबको
वीर बनाने वाला ( रयिम् ) धन ( नि ) नियमपूर्वक ( यच्छतम् ) तुम दोनों दो ॥
४-आ वो वहन्तु सप्तयो रघुष्यदो रघुषत्वानः प्र जिगात बाहुभिः । सीदता
बर्हिरु रु वः सदस्कृतं मादयध्वं मरुतो मध्वो अन्धसः-अथ० २० । १३ । २,
ॠ० १ । ८५ । ६ ॥ ( मरुतः ) हे विद्वान् शूरो ( वः ) तुमको ( रघुष्यदः ) शीघ्रगामी
( सप्तयः ) घोड़े ( आ वहन्तु ) सब ओर ले चलें, ( रघुषत्वानः ) शीघ्रगामी तुम
( बाहुभिः ) भुजाओं [ हस्तक्रियाओं ] से ( प्र जिगात ) आगे बढ़ो । और ( उरु बर्हिः )
चौड़े आकाश में ( आ सीदत ) आओ जाओ, ( वः ) तुम्हारे लिए ( सदः ) स्थान
( कृतम् ) बनाया गया है, ( मध्वः अन्धसः ) मधुर अन्न से ( मादयध्वम् ) [ सबको ]
तृप्त करो ॥
५-ऽमेव नः सुहवा आ हि गन्तन नि बर्हिषि सदतना रणिष्टन । अथा
मन्दस्व जुजुषाणो अन्धसस्त्वष्टर्देवेभिर्जनिभिः सुमद्गणः - ऋ० २ । ३६ । ३ ॥
( सुहवाः ) हे अच्छे प्रकार पुकार सुनने वाले विद्वानों ! ( अमा इव ) घर के समान
( नः ) हममें ( हि ) निश्चय करके ( आ गन्तन ) आओ, ( बर्हिषि ) वृद्धिकारक
व्यवहार में ( नि सदतन ) बैठो और ( रणिष्टन ) उपदेश करो । ( अथ ) फिर
( त्वष्टः ) हे सूक्ष्म करने वाले ! [ सभापति ] ( देवेभिः ) दिव्य गुणों से ( जनिभिः )
जनता के साथ ( अन्धसः जुजुषाणः ) अन्न का सेवन करता हुआ और ( सुमद्गणः )
बड़े माननीय सभासदों वाला तू ( मन्दस्व ) आनन्द पा ॥
६-इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य सोमस्य दस्त्रा जठरं पृणेथाम् । आ
वामन्धांसि मदिराण्यग्मन्नुप ब्रह्माणि शृणुतं हवं मे — ऋ० ६ । ६९ । ७ ॥ ( दस्त्रा
इन्द्राविष्णू ) हे दुःखनाशक इन्द्र और विष्णु [ वायु और बिजुली के समान दोनों राजा और
मन्त्री ] ( अस्य मध्वः सोमस्य ) इस मीठे सोम आदि ओषधियों के रस का ( पिबतम् )
पान करो और ( जठरं पृणेथाम् ) उदर को भरो । ( मदिराणि अन्धांसि ) आनन्द
देने वाले अन्न ( वाम् ) तुम दोनों को ( आ अगमन् ) प्राप्त हुए हैं, ( ब्रह्माणि ) वेदज्ञानों
ओर ( मे हवम् ) मेरी पुकार को ( उप शृणुतम् ) तुम दोनों समीप से सुनो ॥