सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 343

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ क० १ ॥ १०५
कण्डिका १ ॥ इन्द्र—अग्नि अर्थात् प्राण और अपान के
लिये यज्ञ के लाभ ॥
( ओम् । आहिताग्नेः अग्नयः वै मांसीयन्ति ) अग्नि स्थापित करने वाले की
[ यजमान की आहवनीय आदि ] अग्नियां मननसाधक [ बुद्धिवर्धक फल, बादाम अखरोट
आदि हव्य ] पदार्थों को चाहती हैं। ( ते एनम् एव यजमानम् अग्रे अभिध्यायन्ति, यः
एतम् ऐन्द्राग्नं पशुं षष्ठे षष्ठे मासे आलभते) वे [ याजक लोग ] इस ही यजमान
को पहिले अच्छे प्रकार ध्यान में करते हैं, जो इस इन्द्र—अग्नि [ प्राण अपान ] देवता
वाले पशु [ जीव ] को छठे छठे महीने अच्छे प्रकार प्राप्त होता है। (तेन एव
इन्द्राग्निभ्यां ग्रसितम् आत्मानम् निरवदयत ) इस कारण से ही इन्द्र और अग्नि
[ प्राण और अपान ] से खाये गये आत्मा की वह निन्दा करता है। ( आयुष्कामः
आलभेत, प्राणापानौ वै इन्द्राग्नी, प्राणापानौ एव आत्मनि धत्तः, आयुष्मान्
भवति ) आयु [ जीवन ] चाहने वाला पुरुष [ प्राण और अपान देवता वाले जीव को
छठे छठे महीने ] अच्छे प्रकार प्राप्त करे, दोनों प्राण और अपान ही इन्द्र और अग्नि हैं,
दोनों प्राण और अपान ही आत्मा को पुष्ट करते हैं, वह [ यजमान ] बड़ी आयु वाला होता
है। ( प्रजाकामः आलभेत. प्राणापानौ वै इन्द्राग्नी प्राणापानौ अनु प्रजाः
प्रजायन्ते, प्रजावान् भवति ) प्रजायें चाहने वाला पुरुष [ प्राण और अपान देवता वाले
जीव को... ] अच्छे प्रकार प्राप्त करे, दोनों प्राण और अपान ही इन्द्र और अग्नि हैं, दोनों
प्राण और अपान के साथ साथ प्रजायें उत्पन्न होती हैं, वह उत्तम प्रजाओं वाला होता है।
( पशुकामः आलभेत, प्राणापानौ वै इन्द्राग्नी, प्राणापानौ अनु पशवः प्रजायन्ते,
पशुमान् भवति ) पशुओं [ जीवों ] को चाहने वाला पुरुष [ प्राण और अपान देवता
वाले जीव को... ] अच्छे प्रकार प्राप्त करे, दोनों प्राण और अपान ही इन्द्र और अग्नि हैं,
प्राण और अपान के साथ साथ पशु उत्पन्न होते हैं, वह उत्तम पशु वाला होता है। (अयः¹-
कामः यामं शुकं शठं हरितं वा आलभेत, एता नाम यः पितृलोके स्याम् इति एतेन
१—( मांसीयन्ति ) मनेर्दीर्घश्च (उ० ३।६४) मन ज्ञाने—सप्रत्ययो दीर्घश्च ।
मांसं मानुषं वा मानसं वा मनोऽस्मिन्त्सीदतीति वा—निरु० ४।३। सुप आत्मनः क्यच्
( पा० ३।१।८) मांस—क्यच् । मांसानि मननसाधकान् बुद्धिवर्धकान् पदार्थान्
फल—बादाम—अक्षोटादीन् इच्छन्ति होमकरणाय ( आहिताग्नेः ) स्थापित-
पावकस्य यजमानस्य ( अग्नयः ) आहवनीयादयः (अभिध्यायन्ति ) सर्वतश्चिन्त-
यन्ति ( आ ) समन्तत् ( लभते ) प्राप्नोति ( ग्रसितम् ) भक्षितम् ( निरवदयत )
निर्वादः, अपवादः । अपवादयति तिरस्करोति ( आत्मनि ) आत्मानम् ( धत्तः )
पोषयतः ( यामम् ) यम—अण् । यमो यच्छतीति सतः—निरु० १०।१६ ।
मध्यस्थानो वायुः । वायुदेवताकम् ( शुकम् ) शुक गतौ—कः । पक्षिविशेषम्
( हरितम् ) हसृरुहिषुपिभ्य इतिः ( उ० १।६७) हृञ् हरणे—इतिः। अश्वम् ।
१. पृ० ३०४ की टि. में प्रदर्शित पाठभेदानुसार 'यामं शुकं हरितमालभेत शठं वा, यः
कामयेत अनामयः.......' यह अन्वय अर्थसङ्गत है ॥ सम्पा० ॥
२०