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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 600 में से

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पृष्ठ 315

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० १० ॥ २७७
दधति ) जो अति मोटे हैं, उन चरु रूप को बहुत दान करने वाले इन्द्र [ वायु ] के लिये
धरे । ( ये क्षोदिष्ठाः तान् चरुं शिपिविष्टाय विष्णवे शृते ) और जो अति सूक्ष्म हैं
उन चरु रूप को प्रकाश में प्रविष्ट [ व्याप्त ] विष्णु [ सूर्य ] के लिये सेवे । ( एते एव
पशवः १ अतिरिच्यन्ते तान् एव आप्नोति तान् एव अवरुन्धे ) [ इस कर्म से ] यही पशु
[ सब जीव ] बढ़ते हैं, वह उनको ही पाता है, उनकी रक्षा करता है (अग्निः वै मध्यमस्य
दाता, इन्द्रः वै ज्येष्ठस्य प्रदाता ) अग्नि ही मध्यम [ बल ] का देने वाला और इन्द्र
[ वायु ] बहुत बड़े [ बल ] का देने वाला है। ( यत् एव इदं क्षुद्रं पशूनां तत् विष्णोः
शिपिविष्टं तत् एव आप्नोति पशून् एव अवरुन्धे ) जो ही यह पशुओं में सूक्ष्म [ कर्म ]
है, वह विष्णु [ व्यापक सूर्य ] का प्रकाश युक्त [ कर्म ] है, उसे ही वह पाता है और पशुओं
[ जीवों ] की ही रक्षा करता है ॥ ६ ॥
भावार्थ :—यथायोग्य विभाग करने से यज्ञ सिद्ध होता है ॥ ६ ॥
कण्डिका १० ॥
या पूर्वा पौर्णमासी सानुमतिर्योत्तरा सा राका या पूर्वा २अमावास्या सा
सिनीवाली योत्तरा सः कुहूश्चन्द्रमा एव धाता च विधाता च यत् पूर्णोऽन्यां वमत्
पूर्णोऽन्यान्तत् मिथुनं यत् पश्यत्यन्यान्नान्यातन्मिथुनं यदमावास्यायाञ्चन्द्रमा अधि-
प्रजायते तन्मिथुनन्तस्मादेवास्मै मिथुनात् पशून् प्रजनयते ॥ १० ॥
कण्डिका १० ॥ पूर्व और उत्तर पौर्णमासी और अमावास्या का विचार ॥
( या पूर्वा पौर्णमासी सा अनुमतिः ) जो पहिली पौर्णमासी [ पूरे चन्द्रमावाली
तिथि वा पूर्णिमा ] है वह अनुमति [ एक कलाहीन चन्द्रमा वाली शुक्ल चतुर्दशी युक्त
पूर्णिमा ] है । ( या उत्तरा सा राका ) जो पिछली [ पौर्णमासी ] है, वह राका [ पूरे
चन्द्रमा वाली तिथि पौर्णमासी ] है । ( या पूर्वा अमावास्या सा सिनीवाली ) और
वह जो पहिली अमावास्या [ चन्द्र और सूर्य के एक साथ बसने की अर्थात् कृष्णपक्ष की
अन्तिम तिथि ] है, वह सिनीवाली [ कृष्णपक्ष में चतुर्दशी सहित अमावास्या जिसमें चन्द्रमा
रूपम् । दध्यात् ( क्षोदिष्ठाः ) क्षुद्र —इष्ठन् । अतिशयेन क्षुद्राः ( शिपिविष्टाय )
सर्वधातुभ्य इन् ( उ० ४ । ११८ ) शितॄ निशाने छेदने - इन् पुकागमः । विष्ऌ
व्याप्तौ—क्तः शिपिविष्टोऽस्मीति प्रतिपन्नरश्मि. । शिपयोऽत्र रश्मय उच्यन्ते तैराविष्टो
भवति—निरु० ५ । ८ । शिपिविष्टः पदनाम—निघ० ४ । २ । संयतरश्मये ।
व्याप्तप्रकाशाय (शृते ) आर्षरूपम् । श्रयते । सेवते ( अतिरिच्यन्ते ) अधिकाः
भवन्ति ( अवरुन्धे ) रक्षति (शिपिविष्टम् ) व्याप्तप्रकाशं रूपम् ॥
१० - ( पौर्णमासी ) पूर्णमासादण् ( वा० पा० ४ । २ । ३५ ) पूर्णमास—अण्,
ङीप् । पूर्णोमासश्चन्द्रोऽस्यां वर्तते सा तिथिः । या पूर्वा पौर्णमासी सानुमतीः, अनुमति-
रनुमननात्—निरु० ११ । २६ । पूर्णिमा ( अनुमतिः ) अनु + मन पूजायां ज्ञाने च—
१. कण्डिका में आये "वा" पद का अर्थ भाष्य में छूटा है ॥
२. पू. सं. 'सा' इत्यधिकः पाठः ॥ सम्पा० ॥