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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 600 में से

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पृष्ठ 313

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० ८ ! ! २७५
यहाँ [ दूर और समीप, अथवा उस जन्म और इस जन्म में ] मेरे प्राण और अपान [ भीतर
और बाहर जाने वाले श्वास ] की रक्षा कर, मेरे समान और व्यान [ नाभि में घूमने वाले
और शरीर में फैलने वाले वायु ] की रक्षा कर, मेरे उदान [ कण्ठस्थ वायु ] और रूप की
रक्षा कर, तू बल है मेरे लिये बल दे, मुझ कर्म करने वाले का मत नाश कर ! ( मे ददतः
मा उपदसः, अहं त्वया समृक्षं प्रजापतिम् ऋध्यासम् इति ) [ हे ओदन ! ] मुझ दान
करते हुये का मत नाश कर, मैं तेरे साथ यथावत् देखने वाले प्रजापति को बढ़ाऊं । ( समृक्षं
प्रजापतिम् एव ऋध्नोति यः एवं वेद, यः एवं वेद ) वह यथावत् देखने वाले प्रजापति
को ही बढ़ाता है, जो ऐसा जानता है, जो ऐसा जानता है ॥ ७ ॥
भावार्थः-जैसे उदर अन्न खाकर सब इन्द्रियों को रस पहुँचाकर पुष्ट और सुखी
करता है, वैसे ही प्रधान पुरुष कर लेकर प्रजा के हित में लगाकर उन्हें पुष्ट और
सुखी करे ॥ ७ ॥
कण्डिका ८ ॥
ये वा इह यज्ञैराभूवंस्तेषामेतानि ज्योतींषि यान्यमूनि नक्षत्राणि तन्नक्ष-
त्राणां नक्षत्रत्वं यन्न क्षियन्ति दर्शपूर्णमासौ वै यज्ञस्यावसानदर्शौ ये वा अनिष्ट्वा
दर्शपूर्णमासाभ्यां सोमेन यजन्ते तेषामेतानि ज्योतींषि यान्यमूनि नक्षत्राणि पतन्तीव
तद्यथा ह वा इदमस्यष्टावसानेनेहावसास्यसि नेहावासस्यसीति नोऽनुच्यन्त एवं
हैवैतेऽमुष्मान् लोकान् नो नुद्यन्ते त एते प्रच्यवन्ते ॥ ८ ॥
कण्डिका ८ ।। दर्शपूर्णमास यज्ञ के साथ ही सोम यज्ञ करने
और यज्ञ करने वालों की उच्च दशा का वर्णन ।।
( ये वै इह यज्ञैः आभूवन् तेषाम् एतानि ज्योतींषि यानि अमूनि नक्षत्राणि )
जो लोग ही यहाँ यज्ञों के साथ सब ओर वर्तमान हुये हैं, उनके यह ज्योति हैं जो वे नक्षत्र
[ चलने वाले वा अनश्वर तारागण ] हैं [ अर्थात् तारागणों के समान उनके कार्य प्रकाशमान
हैं ] । ( तत् नक्षत्राणां नक्षत्रत्वं यत् न क्षियन्ति ) वह नक्षत्रों का नक्षत्रपन है कि वे
नष्ट नहीं होते हैं । ( दर्शपूर्णमासौ वै यज्ञस्य अवसानदर्शौ ) अमावस्या और पूर्णमासी
के यज्ञ ही यज्ञ की सीमा दिखाने वाले हैं [ अर्थात् अमावस्या और पूर्णमासी से यज्ञ आरम्भ
होकर अमावस्या और पूर्णमासी को पूरे होते हैं ] । ( ये वै दर्शपूर्णमासाभ्याम् अनिष्ट्वा
हिंसायाम्—लुङ् । आत्मनेपदम् । मा हिंषीः ( ऊर्कं ) बलम् ( ऊर्जम् ) बलम्
( मा क्षेष्ठाः ) नाशं मा कुरु ( मा उपदसः ) दसु उपक्षये उत्क्षेपे च—लुङ् । नाशं
मा कुरु ( समृक्षम् ) स्तुव्रश्चिकृत्यृषिभ्यः कित् ( उ० ३ । ६६ ) ऋषी गतौ दर्शने
च—सप्रत्ययः कित् । संगन्तारम् । सन्दर्शकम् ( ऋध्यासम् ) सम्यग्वर्धयासम्
( ऋध्नोति ) वर्धयति ॥
८ ( आभूवन् ) आं—अभूवन् ( नक्षत्राणि ) अमिनक्षियजि० ( उ० ३ । १०५ )
णक्ष गतौ—अत्रन् । गतिशीलाः । अनश्वराः वा तारागणः ( क्षियन्ति ) नश्यन्ति