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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 600 में से

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पृष्ठ 290

२५२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० २४
कण्डिका २४ ॥ तपस्वी वैश्वानर से श्रद्धा में अङ्गिरा ऋषि की उत्पत्ति
और वेदों का यज्ञों तथा ऋत्विजों से सम्बन्ध ॥
( तपस्वी वैश्वानरः अपत्यम् ईप्सन् तपसा श्रद्धायां रेतः सिषिचे. ततः यज्ञे
ऋषेः लोकजित् सोमजम्भाः ऋषिः अङ्गिराः सम्बभूव १ ) तपस्वी [ ऐश्वर्यवान् ]
वैश्वानर [ सब के नेता परमेश्वर ] ने संतान की इच्छा करते हुये तप से श्रद्धा [ सत्य
धारण करने की शक्ति वा भक्ति ] में बीज सींचा [ सामर्थ्य दिया ], तब यज्ञ [ सत्कर्म ]
में उस ऋषि [ सन्मार्गदर्शक परमात्मा ] से लोकों को जीतने वाला, सोम [ अमृत ] का
भक्षण कराने हारा ऋषि [ सन्मार्ग दर्शक ] अङ्गिरा [ ज्ञानवान् वेद ] उत्पन्न हुआ । १ ।
( यः ऋषेः चतुर्विधस्य यज्ञस्य श्रेयसीं श्रद्धाम् अमुं लोकं जिगाय, यस्मै सोम-
बिन्दुयुक्ताः प्रस्रुताः वेदाः सुकृताम् उ लोकं वहन्ति २ ) जिस [ वैश्वानर ] ने ऋषि
[ सन्मार्गदर्शक ] चार प्रकार के यज्ञ की अति श्रेष्ठ श्रद्धा को उस लोक [ सर्वत्र प्रसिद्ध
स्थान ] से जीता था, और जिस [ वैश्वानर परमेश्वर ] के लिये सोम [ अमृत वा मोक्ष ]
के बिन्दु से युक्त प्रसिद्ध वेद [ पुण्यात्माओं को ] सुकर्मियों के ही लोक में पहुंचाते हैं । २ ।
( अस्य प्रमुदः मोदमानाः ऋचः उक्थशस्त्रैः ग्रहैः हविर्भिः च चतुरः भागान्
वहन्ति । ३ । यजूंषि तावत् कृताकृतैः च औदुम्बर्य्यां सामघोषेण संविष्टुतिभिः
स्तोमैः चतुर भागान् वहन्ति, सामानि छन्दसा गीत्या स्तोमेन प्रस्तावेन सह च
चतुरः भागान् वहन्ति, ४ ) उस [ वैश्वानर परमात्मा ] की आनन्दों को बढ़ाने वाली
ऋचायें [ पदार्थों की गुणसूचक विद्यायें ] उक्थों, शस्त्रों, ग्रहों [ लेने योग्य पदार्थों ] और
हवियों [ देने योग्य वस्तुओं, इन चारों ] से चार भागों को पहुंचाती हैं । ३ । यजुर्वेद
मन्त्र [ संगतिकरण विद्यायें ] तो किये हुये और न किये हुये [ मन में विचारे हुये ]
कर्मों से और उदुम्बर [ गूलर ] की बनी चौकी पर सामवेद [ मोक्षविद्या ] से, और
विशेष स्तुतियों सहित स्तोत्रों [ इन चारों ] से चार भागों को पहुँचाते हैं, और सामवेद
मन्त्र [ मोक्ष विद्यायें ] छन्द [ आह्लादक कर्म ], गीति [ गान विद्या ], स्तोम और
प्रस्ताव के सहित [ इन चारों से ] चार भागों को पहुँचाते हैं । ४ । ( प्रमुदः मोदमानाः
अथर्वाण. अङ्गिरसः च प्रायश्चित्तैः भेषजैः संस्तुवन्तः शान्ताः [ सन्तः ] असंस्तु-
२४--( श्रद्धायाम् ) श्रत् सत्यं-निघ० ३ । १० । भिद्मिदादिभ्योऽङ् ( पा० ३ ।
३ । १०४ ) श्रत्+दधातेः--अङ्, टाप् । श्रद्धा श्रद्धानात्--निरु० ६ । ३० । सत्य-
धारणशक्तौ । भक्तौ ( रेतः ) बीजम् । सामर्थ्यम् (तपस्वी ) ऐश्वर्यवान् ( वैश्वा-
नरः ) स्वार्थे--अण्, दीर्घश्च । विश्वेषां नरो नेता ( सोमजम्भाः ) गतिकारको-
पपदयोः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वं च ( उ० ४।२२७ ) सोम+जभि मैथुने जृम्भणे
नाशने च--असिः । सोमस्य अमृतस्य जम्भो भक्षणं यस्मात् सः । जम्भो भक्ष्ये दन्ते
च ( ऋषेः ) ऋषिदर्शनात्--निरु० २ । ११ । सन्मार्गदर्शकस्य ( ऋषिः ) सन्मार्ग-
दर्शकः ( अङ्गिराः ) ज्ञानवान् । वेदः । वेदवेत्ता ( श्रेयसीम् ) अतिप्रशस्ताम्
( जिगाय ) जितवान् ( सोमबिन्दुयुक्ताः ) अमृतबिन्दुयुक्ताः ( वहन्ति )