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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 600 में से

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पृष्ठ 254

२१६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० ३ ॥
नक्षत्राणां रूपं लोमानि ओषधिवनस्पतीनाम् ) नख नक्षत्रों के रूप हैं और रोम
ओषधि वनस्पतियों के । ( ऊरू चतुर्विशम् अहः, उरः अभिप्लवं, पृष्ठयं पृष्ठ्यः )
दोनों जंघायें चतुर्विश अहः छाती [ हृदयस्थान ] अभिप्लव, और पीठ पृष्ठ्य है । ( शिरः
एव त्रिवृत् त्रिवृतं हि एव शिरो भवति त्वक् अस्थि मज्जा मस्तिष्कम् ) शिर हो
त्रिवृत् है, क्योंकि तीन अवयव वाला ही शिर होता है त्वचा, हाड़, मज्जा [ हाड़ों का
सार ] अथवा मस्तिष्क [भेजा वा घृत के रूप में चिकनाई]। ( ग्रीवाः पंचदशः चतुर्दश
हि एव एतस्यां कराणि भवन्ति वीर्यं पंचदशम् ) ग्रीवा पचदश यज्ञ है [ क्योंकि ]
इसमें चौदह ही [ अवयव विशेष ] होते हैं और पन्द्रहवां वीर्य [ बल ] है, ( तस्मात्
इयम् आभिः अण्वीभिः सतीभिः गुरुं भारं हरति तस्मात् ग्रीवाः पंचदशः ) इसलिये
यह [ ग्रीवा ] इन छोटी छोटी नाड़ियों में होती हुई के द्वारा भारी बोझ ले जाती है,
इसलिये ग्रीवा पंचदश यज्ञ है । ( उरः सप्तदश ओष्ठौ अन्ये यत्र वा ओष्ठौ अन्ये
उरः सप्तदशं तस्मात् उरः सप्तदशः ) उरः [ ग्रीवा और उदर का बीच ? ] सप्तदश
यज्ञ है कोई कोई दोनों ओंठ [ बताते हैं ] और दूसरे जहां दोनों ओष्ठ हैं वहां उरः
सत्रहवां [ कहते हैं ], इसलिये उरः सप्तदश यज्ञ है। ( उदरम् एकविंशः
विंशतिर्हि एव एतस्य आन्तरे उदरे उत्तापानि भवन्ति, उदरम् एकविंशम्,
तस्मात् उदरम् एकविंशः) उदर [ पेट ] एकविंश यज्ञ है, [ क्योंकि ] बीस
ही इसके भीतरले उदर में उत्ताप [ तापवाली आंतें ] हैं और उदर इक्कीसवां
है, इसलिये उदर एकविंश यज्ञ है । ( पार्श्वे त्रिणवः अन्याः पर्शवः त्रयोदश
अन्याः पार्श्वे त्रिणवः तस्मात् पार्श्वे त्रिणवः ) दोनों पार्श्व [ कांख के नीचे के
स्थान ] त्रिणव यज्ञ है, कोई पसलियां त्रयोदश यज्ञ और कोई दोनों पार्श्व [ कांख के
नीचे के स्थान ] त्रिणव यज्ञ है [ ऐसा कहते हैं ] इसलिये दोनों पार्श्व त्रिणव यज्ञ हैं ।
( अनूकं त्रयस्त्रिंशः, द्वात्रिंशतिः हि एव एतस्यां पृष्टी कुण्डी उलानि भवन्ति
अनूकं त्रयस्त्रिंशः तस्मात् अनूकं त्रयस्त्रिंशः) अनूक [ मूत्र थैली ] त्रयस्त्रिंश यज्ञ है,
[ क्योंकि ] बत्तीस ही इसमें पृष्टी, कुण्डी, और उल [ नाड़ी विशेष ] हैं और अनूक तैती-
सवां है, इस लिये अनूक त्रयस्त्रिंश यज्ञ है । ( तस्य दक्षिणःबाहुः अयम् एव अभिजित् )
उस [ मनुष्य ] का दाहिना बाहु ही यह अभिजित् यज्ञ है, ( तस्य दक्षिणे इमे त्रयः
प्राणाः स्वरसामानः ) उसके दाहिने [ बाहु ] में यह तीन प्राण [ भुजदण्ड, भुजा
और हाथ ] स्वरसाम यज्ञ हैं । ( आत्मा विषुवान् ) [ उसका ] आत्मा विषुवान् यज्ञ
है । ( तस्य सव्ये इमे त्रयः प्राणाः अर्वाक् स्वरसामानः ) उसके बायें [ बाहु ] में
[ पूर्वोक्त ] तीन प्राण अर्वाक् स्वरसाम यज्ञ हैं । ( तस्य अयम् सव्यः बाहुः विश्वजित् )
उसका यह बायां बाहु विश्वजित् यज्ञ है । ( उक्तौ पृष्ठचाभिप्लवौ ) दोनों पृष्ठ्य
३–( वाव ) एव ( तस्य ) पुरुषस्य ( प्रयन्ति ) प्रकर्षेण गच्छन्ति ( तयोः )
पादयोः ( ऊरू ) जंघे ( पृष्ठचम् ) स्वार्थे यत् । पृष्ठम् ( त्रिवृतम् ) त्रि + वृतृ वरणे-
क्तः । त्र्यवयवयुक्तम् ( मज्जा ) टुमस्जो शुद्धौ-अच् टाप् । अस्थिसारः ( मस्तिष्कम् )
मस्तकस्थो घृताकारः पदार्थः ( ग्रीवाः ) कन्धराः ( एतस्याम् ) ग्रीवायाम् (कराणि)