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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 600 में से

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पृष्ठ 204

१६६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० १६
चक्षुषी सूर्याचन्द्रमसौ, सा स्वाहा सा स्वधा सैषा यज्ञेषु वषट्कारभूता प्रयुज्यते,
तस्या अग्निदैवतं ब्राह्मणो रूपमिति ब्राह्मणम् ॥ १६ ॥
कण्डिका १६ ॥ स्वाहा शब्द के विषय में प्रश्नोत्तर ॥
(स्वाहा वै कुतः सम्भूता १, केन प्रकृता २, किं वै अस्याः गोत्रम् ३, कत्यक्षरा
४ कतिपदा ५, क.ति १वर्णाः ६ किंपूर्वावसाना ७, क्वचित् स्थिता ८, किमधिष्ठाना
६, ब्रूहि स्वाहायाः यत् दैवतम् १० रूपं च ११) स्वाहा [ सुवाणी, आशीर्वाद,
सुदान ] कहां से उत्पन्न हुई १, किस करके बनाई गई २. क्या इसका गोत्र है ३, कितने
अक्षर वाली है. ४, कितने पाद वाली है ५, कितने वर्ण वाली है ६, कौन आदि अन्त वाली है
७, कहां ठहरी हुई है ८, कौन अधिष्ठान [ आश्रय ] वाली है ६, तू बता स्वाहा का जो
देवता :० और रूप है ११, (स्वाहा वै सत्यसम्भूता) [ उत्तर ] स्वाहा सत्य से
उत्पन्न है १, (ब्रह्मणा प्रकृता) ब्रह्म करके बनाई गई है २, (लामगायनसगोत्रा)
लामगायन [ मनोहर वेदों के गाने वाले ] के साथ एक गोत्र वाली है ३, (द्वे अक्षरे)
दो अक्षर हैं ४, (एकं पदम्) एक पाद है ५, (त्रयः च वर्णाः शुक्लः पद्मः सुवर्णः
इति) और तीन वर्ण हैं शुक्ल [ श्वेत ], पद्म [ कमलवर्ण ] और सुवर्ण [ सोना ] ६,
(वेदेषु सर्वच्छन्दसां समासभूता वर्णान्ते एकोच्छ्वासा) वेदों में सब छन्दों के संग्रह
रूप और वर्णों के अन्त में एक श्वास वाली है ७, (चत्वारः वेदाः षट् अङ्गानि शरीरे,
ओषधिवनस्पतयः लोमानि चक्षुषी सूर्याचन्द्रमसौ) चारों वेद और छह अङ्ग
[ शिक्षा कल्प व्याकरण निरुक्त छन्द और ज्योतिष ] दो शरीर, ओषधि वनस्पति लोम
और दोनों आंखें सूर्य चन्द्रमा हैं ८, (सा स्वाहा सा स्वधा सा एषा यज्ञेषु वषट्कारभूता
प्रयुज्यते, तस्याः अग्निः दैवतम् ब्राह्मणः रूपम् इति ब्राह्मणम्) वह स्वाहा वह
स्वधा और वही वषट्कार रूप होकर यज्ञों में प्रयुक्त की जाती है, उसका अग्नि देवता ६.
और ब्राह्मण [ वेदज्ञाता ] रूप है १०-यह ब्राह्मण है ॥ १६ ॥
१६-(स्वाहा) सु + आङ् + ह्वेञ् आह्वाने-डा। वाङ्नाम-निघ० १ । १२
स्वाहेत्येतत् सु आहेति वा स्वा वागाहेति वा स्वं प्राहेति वा स्वाहुतं हविर्जुहो-
तीति-निरु० ८ । २० सुवाणी। आशीर्वादः। सुदानम्। (संभूता) उत्पन्ना
(प्रकृता) सृष्टा (कतिपदा) कतिपादयुक्ता (किंपूर्वावसाना) किमाद्यन्ता
(लामगायनसगोत्रा) रमु क्रीडायाम्- घञ्, रस्य लः, गै गाने ल्युट्।
लामगायनेन रामगायनेन मनोहरवेदगायकेन समानगोत्रा (समासभूता) संग्रह-
भूता (एकोच्छ्वासा) एकश्वासयुक्ता। एकविरामा (वर्णान्ते) मन्त्राणां वर्णान्ते
(शरीरे) शरीरद्वयम्॥
१. पूर्व संस्करण में "कति वर्णाः" यह प्रश्नात्मक पाठ कण्डिका में नहीं है, किन्तु
उत्तर दिया है, तथा जर्मन सं. में भी कण्डिका में है अतः हमने बढ़ाया है। उत्तरों में
'किम्पूवावसाना" का उत्तर कण्डिका में नहीं है अतः कण्डिका का पाठ अस्त व्यस्त प्रतीत
होता है। पाठान्तरों के अभाव में हम संशोधन नहीं कर सके ॥ सम्पा० ॥