गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाला कर्म है ३, (वत्सम् उन्नीयमानम् किंदेवत्यम् ४) बछड़े को लाया जाता हुआ
कर्म कौन देवता वाला है ४, (वत्सम् उन्नीतं किंदेवत्यम् ५) बछड़ा लाया गया कर्म
कौन देवता वाला है ५, (दुह्यमानं किंदेवत्यम् ६) दुहता हुआ कर्म क्या देवता है ६,
(दुग्धं किंदेवत्यम् ७) दूध क्या देवता है ७, (प्रक्रम्यमाणं किंदेवत्यम् ८) घुमाया
जाता हुआ [दूध] क्या देवता है ८, (ह्रियमाणं किंदेवत्यम् ९) लिया जाता हुआ
[दूध] क्या देवता है ६, (अधिश्रियमाणं किंदेवत्यम् १०) रक्खा जाता हुआ दूध
क्या देवता है १०, (अधिश्रितं किंदेवत्यम् ११) रक्खा गया दूध क्या देवता है ११,
(अभ्यवज्वाल्यमान किंदेवत्यम् १२) औंटता हुआ दूध क्या देवता है १२, (अभ्य-
वज्वालितं किंदेवत्यम् १३) औंटा हुआ दूध क्या देवता है १३, (समुद्वान्तं
किंदेवत्यम् १४) उफनता हुआ दूध क्या देवता है १४, (विष्यन्नं किंदेवत्यम् १५)
बहता हुआ दूध क्या देवता है १५, (अद्भिः प्रत्यानीतं किंदेवत्यम् १६) जल से
लौटा दिया गया दूध क्या देवता है १६. (उद्वास्यमानं किंदेवत्यम् १७) छोड़ा जाता
हुआ दूध क्या देवता है १७, (उद्वासितं किंन्देवत्यम् १८) छोड़ा हुआ दूध क्या
देवता है १८, (उन्नीयमानं किंदेवत्यम् १९) ऊपर लाया जाता हुआ [नवनीत = माखन]
क्या देवता है १९, (उन्नीतं किंदेवत्यम् २०) ऊपर लाया गया नवनीत क्या देवता
है २०, (प्रक्रम्यमाणं किंदेवत्यम् २१) घुमाया जाता हुआ नवनीत क्या देवता है २१,
(ह्रियमाणं किंदेवत्यम् २२) लिया जाता हुआ नवनीत क्या देवता है २२, (उप-
साद्यमानं किंदेवत्यम् २३) पास लाया जाता हुआ नवनीत क्या देवता है २३, (उपसादितं
किंदेवत्यम् २४) पास रक्खा गया नवनीत क्या देवता है २४, (समित् किंदेवत्या
२५) समिधा कौन देवता वाली है २५, (किंदेवत्यां प्रथमाम् आहुतिम् अहौषीः २६)
कौन देवता वाली पहिली आहुति को तूने दिया है २६, (किंदेवत्यं गार्हपत्यम्
अवेक्षिष्ठाः २७) कौन देवता वाली गार्हपत्य अग्नि वाली हवि को तूने विचारा है २७,
(किंदेवत्या उत्तरा आहुतिः २८) कौन देवता वाली पिछली आहुति हैं २८,
(किंदेवत्यं हुत्वा उदञ्चं स्रुचं त्रिः उदनंषीः २९) कौन देवता वाली हवि को देकर
उत्तर की ओर रक्खी हुई स्रुचा [वट के पत्ते के समान रूप वाला विकङ्कत काठ का बना
हुआ भुजा तुल्य चमच] को तीन बार तूने उठाया है २६, (किंदेवत्यं स्रुचं बर्हिषि
निधाय उन्मृज्य उत्तरतः पाणी निरमार्क्षीः ३०) कौन देवता वाली स्रुचा
को कुशासन पर धर के ओर धोके उत्तर की ओर दोनों हाथों को तूने धोया है ३०,
(किंदेवत्यं द्वितीयम् उन्मृज्य पित्र्युपवीतं कृत्वा दक्षिणतः पितृभ्यः स्वधाम्
धेनो (इडायान्) इल गतौ कः, टाप् । प्रापणीयायां गवि (उपमृष्टायाम्)
संगतायाम् (वत्सम्) गोशिशुम् (प्रक्रम्यमाणम्) मध्यमानम् (ह्रियमाणम्) निः-
स्रियमाणम् (समुद्वान्तम्) सम् + उद् + टुवम उद्गिरणे-क्तः । उद्गीर्णम् । उद्गतम्
(विष्यन्नम्) वि + ष्यन्दू प्रस्रवणे-क्तः । प्रस्रुतम् (उद्वास्यमानम्) विसृज्यमानम्
(उद्वासितम्) विसृष्टम् (उपसादितम्) समीपे स्थापितम् (अहौषीः) हु दानादनयोः-
लुङ् । हुतवान् असि (अवेक्षिष्ठाः) अव + ईक्ष दर्शने-लुङ्, आडभावः । दृष्टवानसि
(स्रुचम्) यज्ञपात्रम् (उदञ्चम्) उदङ्मुखं कृत्वा (उत्तरतः) उत्तरस्यां दिशि