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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 600 में से

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पृष्ठ 140

१०२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० १२
देव नुद्गातेत्येवोद्गातारं ब्रूयाच्चक्षुरिति चक्षुर्नह्रोति ब्रह्म, देव इति देवं ब्रह्मोत्येव
ब्रह्माणं ब्रूयान्मन इति मनो ब्रह्मेति ब्रह्म देव इति देवम् ॥ १२ ॥
कण्डिका १२ ॥ काबन्धि का अधिक यज्ञ विषयक विचार ॥
( तत् यथा ह वै इदम् यजमानः च याजयितारः च दिवं ब्रूयुः पृथिवी इति,
पृथिवीं ब्रूयुः वाक् द्यौः इति ) [ काबन्धि बोला ] सो जैसे यह बात है कि यजमान
और याजक लोग प्रकाश को कहें यह पृथिवी है, और पृथिवी को कहें वह वाणी [ वा ]
प्रकाश है। ( तत् अन्यः न अनुजानाति एताम् एवं न अनुजानाति यत् एतत् ब्रूयात्
अथ नु कदम् इति ) उसको दूसरा पुरुष नहीं जान लेता है, इस [ वार्ता ] को ऐसा नहीं
जान लेता है कि इसको [ वैसा ही ] वह कहे. फिर यह कैसे हो सकता है । ( होता
इति एव होतार ब्रूयात्, वाक् इति वाचम्, ब्रह्म इति ब्रह्म, देवः इति देवम्,
अध्वर्युः इति एव अध्वर्युं ब्रूयात् ) यह होता [ होम करने वाला ] ही है, होता को
कहे, यह वाणी है वाणी को, यह ब्रह्म [ वेदज्ञान ] है ब्रह्म [ वेदज्ञान ] को, यह देवता है
देवता को, और यह अध्वर्यु ही है अध्वर्यु को बतावे । ( प्राणापानौ इति प्राणापानौ,
ब्रह्म इति ब्रह्म देवः इति देवं, उद्गाता इति एव उद्गातारं ब्रूयात् ) यह प्राण
और अपान हैं प्राण और अपान को, यह ब्रह्म है ब्रह्म को, यह देवता है देवता को, और
यह उदगाता ही है उद्गाता को ही बतावे । ( चक्षुः इति चक्षुः, ब्रह्म इति ब्रह्म, देवः
इति देवम्, ब्रह्मा इति एव ब्रह्माणम् ब्रूयात् ) यह आंख है आंख को, यह ब्रह्म है ब्रह्म
को, यह देवता है देवता को, और यह ब्रह्मा ही है ब्रह्मा को बतावे । ( मनः इति मनः,
ब्रह्म इति ब्रह्म, देवः इति देवम् ब्रूयात् ) यह मन है मन को, यह ब्रह्म [ वेदज्ञान ] है
ब्रह्म [ वेदज्ञान ] को, यह देवता है देवता को [ बतावे ] ॥ १२ ॥
भावार्थः—मनुष्य को यथार्थ और स्पष्ट बोलना चाहिये ॥ १२ ॥
कण्डिका १३ ॥
नाना प्रवचनानि ह वा एतानि भूतानि भवन्ति ये चैवासोमपं याजयन्ति
ये च सुरापं ये च ब्राह्मणं विच्छिन्नं सोमयाजिनं तं प्रातः समित्पाणय उपोदेयु-
रुपायामो भवन्तमिति, किमर्थमिति यानेव नो भवांस्तान् ह्यः प्रश्नानपृच्छत्तानेव
नो भवान् व्याचक्षीतेति, तथेति तेभ्य एतान् प्रश्नान् व्याचष्टे, तद्येन ह वा इदं
विद्यमानश्चाविद्यमानश्चाभिनिदधाति तद् ब्रह्म तद्यो वेद स ब्राह्मणोऽधीयानो
ऽधीत्याचक्षत इति ब्राह्मणम् ॥ १३ ॥
कण्डिका १३ ॥ काबन्धि का आगे यज्ञ विषयक विचार ॥
( नाना प्रवचनानि ह वै एतानि भूतानि भवन्ति ये च एव असोमपं ये च
सुरापं ये च विच्छिन्नं ब्राह्मणं सोमयाजिनं याजयन्ति ) अनेक प्रकार से प्रसिद्ध बातें
१२—( दिवम् ) प्रकाशम् ( ब्रूयुः ) कथयेयुः ( अनुजानाति ) निरन्तरम्
अनुभवति ॥