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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 600 में से

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पृष्ठ 105

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३८ ६७
गये, ग्रसे गये और प्रधानता से छूये गये हैं। ११ । (वेदैः यज्ञः अभिपन्नः ग्रसितः
परामृष्टः) वेदों करके यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान व्यवहार] सब ओर से
पाया गया, ग्रसा गया और प्रधानता से छूआ गया है। १२। (तानि ह वै एतानि
द्वादश महाभूतानि एवंविधिप्रतिष्ठितानि तेषां यज्ञः एव पराद्धर्ध्यः) यही बारह
महातत्त्व इस प्रकार विधान के साथ ठहरे हुये हैं, उनमें यज्ञ ही अति श्रेष्ठ है ॥ ३७ ॥
भावार्थः-ब्रह्मज्ञानी पुरुष ब्रह्म आदि बारह तत्त्वों के यथावत् ज्ञान से परम गति
पाता है ॥ ३७ ॥
कण्डिका ३८ ॥
तं ह स्मैतमेवं विद्वांसो मन्यन्ते विद्म एनमिति याथातथ्यमविद्वांसोऽयं
यज्ञो वेदेषु प्रतिष्ठितो १, वेदा वाचि प्रतिष्ठिता २, वाङ् मनसि प्रतिष्ठिता ३,
मनः प्राणे प्रतिष्ठितं ४, प्राणोऽन्ने प्रतिष्ठितो ५, ऽन्नं भूमौ प्रतिष्ठितं ६ भूमिरप्सु
प्रतिष्ठिता ७, आपो ज्योतिषि प्रतिष्ठिता ८, ज्योतिर्वायौ प्रतिष्ठितं ६, वायुरा-
काशे प्रतिष्ठितः १० आकाशं ब्रह्मणि प्रतिष्ठितं ११, ब्रह्म ब्राह्मणे ब्रह्मविदि प्रति-
ष्ठितं १२, यो ह वा एवं वित् स ब्रह्मवित्, पुण्यां च कीर्तिं लभते सुरभींश्च
गन्धान् सोऽपहतपाप्मानन्तां श्रियमश्नुते य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतां वेदानां
मातरं सावित्रींसम्पदमुपनिषदमुपास्त इति ब्राह्मणम् ॥ ३८ ॥
कण्डिका ३८ ॥ दूसरे प्रकार से पूर्वोक्त बारह तत्त्वों
का विचार
(तं ह स्म एतम् एवं विद्वांसः मन्यन्ते विद्मः एनम् इति याथातथ्यम्
अविद्वांसः) उस ही [यज्ञ] को इस प्रकार जानने वाले मानते हैं—हम इस [यज्ञ]
को जानते हैं—सचमुच वे अज्ञानी हैं। (अयम् यज्ञः वेदेषु प्रतिष्ठितः) यह यज्ञ
[देवपूजा संगतिकरण दानव्यवहार] वेदों में ठहरा हुआ है। १। (वेदाः वाचि
प्रतिष्ठिताः) वेद वाणी में ठहरे हुये हैं। २। (वाक् मनसि प्रतिष्ठिता) वाणी
मन में ठहरी हुई है। ३। (मनः प्राणे प्रतिष्ठितम्) मन प्राण में ठहरा हुआ है। ४।
(प्राणः अन्ने प्रतिष्ठितः) प्राण अन्न में ठहरा हुआ है। ५। (अन्नं भूमौ
प्रतिष्ठितम्) अन्न भूमि में ठहरा हुआ है। ६। (भूमिः अप्सु प्रतिष्ठिता) भूमि
जल में ठहरी हुई है। ७। (आपः ज्योतिषि प्रतिष्ठिताः) जल प्रकाश में ठहरा
हुआ है। ८। (ज्योतिः वायौ प्रतिष्ठितम्) प्रकाश पवन में ठहरा हुआ है। ६।
(वायुः आकाशे प्रतिष्ठितः) पवन आकाश में ठहरा हुआ है। १०। (आकाशम्
ब्रह्मणि प्रतिष्ठितम्) आकाश ब्रह्म [परमात्मा] में ठहरा हुआ है। ११। (ब्रह्म
३८-(तम्) पूर्वोक्तं यज्ञम् (विद्वांसः) जानन्तः (मन्यन्ते) जानन्ति।
(विद्मः) वयं जानीमः (एनम्) यज्ञम् (याथातथ्यम्) यथातथा—प्यञ्।
वास्तविकं पदार्थम् (अविद्वांसः) अविदन्तः (पुण्याम्) पवित्राम् (सुरभीन्)
मनोहरान् (अपहतपाप्मा) विनष्टपापः (अनन्तां श्रियम्) अनन्तसेवनीयसम्प-