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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं मंगलाचरण

SRI RAMAKRISHNA ASHRAMA
LIBRARY, SRINAGAR.
Accession No. 3737
Date 23.8.1985
श्रीमद्गोस्वामीतुलसीदासकृत
गीतावली
हिन्दी-अनुवाद सहित
गीताप्रेस गोरखपुर।
मूल्य पाँच रुपये

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है। यह एक सादा/कोरा कागज़ (ब्लैंक पेज) है।

294 / RL
SRI RAMAKRISHNA ASHRAM
LIBRARY
Shivalya, Karan Nagar,
SRINAGAR.
Class No. 294.5922
Book No. Tul G, 2
Accession No. 3737.

इस पृष्ठ/छवि में कोई पाठ (टेक्स्ट) अंकित नहीं है; यह केवल एक सादा भूरा कागज़ (kraft paper/cardboard) है।

श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी रचित
गीतावली
(सरल भावार्थ सहित)
गीता प्रेस, गोरखपुर

प्रकाशक
गोविन्द भवन कार्यालय
गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० १९९१ से २०२७ तक १,४१,२५०
सं० २०३१ तेरहवाँ संस्करण १५,०००
सं० २०४१ चौदहवाँ संस्करण २५,०००
कुल १,८१,२५०
एक लाख इक्यासी हजार दो सौ पचास
मूल्य—पाँच रुपया
मिलने का पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)
मुद्रक—भार्गव प्रेस, अमीनाबाद लखनऊ।

श्रीराम
श्रीरघुनाथ-कथामृत-पोसित
काव्यकला रति-सी छबि छाई।
ताहि अनेकन भूषन भूषि
बरी तुलसी अति ही हरसाई॥
जोवत सो जुग-जोरी खरी
हुलसी हुलसी अति मोद उछाई।
सो हुलसीके हियेको हुलास
हरै हमरे जियकी जड़ताई॥

निवेदन
गीतावलीके द्वितीय संस्करणमें सम्माननीय प्रो० श्री-
विश्वनाथप्रसादजी मिश्र एम्० ए०, साहित्यरत्नने अनुवादमें
कई जगह संशोधन करनेकी कृपा की थी । तबसे इसके
ग्यारह संस्करण और हो गये और अब यह चौदहवाँ संस्करण
पाठकोंके हाथमें है । आशा है कि प्रेमी पाठक इसे भी पहलेकी
भाँति ही अपनानेकी कृपा करेंगे ।
प्रकाशक

· श्रीहरिः
दो शब्द
───x───
कविचक्रचूडामणि गोसाईं श्रीतुलसीदासजीके ग्रन्थोंमें
कलेवरकी दृष्टिके रामचरितमानसके पश्चात् दूसरा नंबर गीतावली-
का ही है । इसमें सम्पूर्ण रामचरित पदोंमें वर्णन किया गया है ।
परन्तु रामायणकी अपेक्षा इसकी वर्णनशैली कुछ दूसरे ही ढंगकी
है । रामायण महाकाव्य है, उसमें सभी रसोंका साङ्गोपाङ्ग
दिग्दर्शन कराया गया है; वहाँ कविहृदयके सभी भावोंका गम्भीर
विश्लेषण देखनेमें आता है । परन्तु गीतावलीमें आरम्भसे लेकर
अन्तपर्यन्त कविका एक ही भाव दिखायी देता है; वह कथानकके
क्रमकी अपेक्षा न करके अपने इष्टदेवकी मधुर झाँकी करानेमें ही
संलग्न है । गीतावलीमें उसका ललित भाव ही व्यक्त हुआ है ।
जहाँ-जहाँ भगवान्‌के रूपमाधुर्य अथवा करुणरसके आस्वादनका
अवसर मिला है, वहाँ-वहाँ तो वे मध्याह्नकालीन सूर्यकी तरह
मन्दगतिसे चलते हैं, इसके विपरीत जहां अन्य विषय है उसकी
ओर दृष्टिपाततक नहीं करते । यहां तक कि अन्य युद्धोंकी तो बात
ही क्या, रावणवधका भी उन्होंने जिक्र नहीं किया; परशुरामजी-
के विषयमें 'भंज्यौ भृगुपति-गरब सहित, तिहुँ लोक बिमोह कयो ॥'
[बाल० ६०] केवल इतना ही कहा है, किष्किन्धाकाण्ड केवल दो
पदोंमें ही समाप्त हो जाता है, लंकादहनका भी हनुमान्‌जीने
सीताजी से विदा होते समय केवल जिक्र ही किया है, तथा
लंकाकाण्ड, जो अन्य रामायणोंमें बहुत विस्तृत मिलता है, यहाँ
अरण्य और किष्किन्धाको छोड़कर और सबसे छोटा है ।
इसके विपरीत भगवान्‌की बाललीला, भरतमिलाप, जटायु-
उद्धार, विभीषणशरणांगति, सीताजीकी वियोगव्यथा, राम-

[ ६ ]
हिंडोला तथा होली आदि सुललित और करुण भावोंका बड़ा ही
विशद और मर्मस्पर्शी वर्णन मिलता है। बालकाण्डके आरम्भमें
भगवान्‌के बालरूपका, अन्तमें जनकपुरकी स्त्रियोंद्वारा उनकी
किशोरमूर्तिका, अयोध्याकाण्डमें ग्रामीण स्त्रियोंद्वारा प्रभुके
तापसवेषका तथा उत्तरकाण्डमें उनके राजवेषका बड़ा ही अनूठा
नख-शिख कहा गया है। परन्तु इतना होनेपर भी गोसाईंजीने
अपना मर्यादा-रक्षणका स्वभाव नहीं छोड़ा। छोड़ते कैसे ?
यह कोई कवि-कल्पनामात्र तो है नहीं; यह तो उनका प्रत्यक्ष
अनुभव है। उनके प्रत्येक पदमें उनके परम पुनीत दास्यभावकी
छाप लगी हुई है।
इस प्रकार यह ग्रन्थरत्न भक्तिरसज्ञ और साहित्यमर्मज्ञ
दोनोंहीका धन है। इन पंक्तियोंके लेखकमें तो इनमेंसे किसी भी
सम्पत्तिका लेशमात्र भी नहीं है। श्रद्धेय मित्रवर पं० श्रीलालजी
याज्ञिकके मुखसे भरतमिलाप और जटायु-उद्धार-सम्बन्धी कुछ
पद सुनकर इसके हृदयमें इस ग्रन्थके अनुवादका मूक संकल्प
हो गया और यह उसका सुयोग देखने लगा। भगवान्‌की असीम
कृपासे आज वह संकल्प पूरा हो गया। यह उन लीलामयकी ही
लीला है कि मुझ-जैसे विद्या-भक्ति-विवेकहीन व्यक्ति को, इच्छा न
रहते हुए भी, इस धंधेमें जोड़ रखा है। जो हो, 'राजी हैं हम उसीमें
जिसमें तेरी रजा है।'
अबतक इस ग्रन्थके कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।
सरस्वतीभण्डार पटनाद्वारा प्रकाशित पाण्डेय श्रीरामावतार
शर्माकी प्रति बी० ए० परीक्षाकी पाठ्यपुस्तकोंमें स्वीकृत है।
उसके अनुसार इसके बालकाण्डमें १०८, अयोध्याकाण्डमें ८६,
अरण्यकाण्डमें १७, किष्किन्धाकाण्डमें २, सुन्दरकाण्डमें ५१,
लंकाकाण्डमें २६ और उत्तरकाण्डमें ३६-इस प्रकार कुल ३२८

[ ७ ]
पद हैं। यही क्रम नागरीप्रचारिणी सभाद्वारा प्रकाशित तुलसी-
ग्रन्थावलीकी प्रतिमें तथा श्रीरामनारायण बुकसेलरद्वारा प्रकाशित
श्रीवामदेवजीकी टीकामें भी है। परन्तु नवलकिशोरप्रेस, लखनऊकी
श्रीवैद्यनाथजीकी टीकावाली और खड्गविलासप्रेसकी महात्मा
हरिहरप्रसादकृत टीकावाली प्रतियोंके बालकाण्डकी पदसंख्या इससे
भिन्न है। पद तो सभी प्रतियोंमें एक-से ही हैं, अन्तर केवल उनकी
गणनामें है। प्रस्तुत पुस्तकके बालकाण्डमें जो १२ से लेकर १५ वें
तक चार पद हैं, उन्हें पहली तीन प्रतियोंमें एक माना है तथा
३७वें पदको दो माना है। हमें उनका मत ठीक नहीं मालूम होता,
क्योंकि पुस्तकके सभी पदोंमें यह क्रम रहा है कि प्रत्येक पदके
अन्तिम चरणमें गोसाईंजीका नाम रहता है। इस न्यायसे खड्ग-
विलास और नवलकिशोर-प्रेसोंकी प्रतियोंका ही पद-विभाग उचित
जान पड़ता है और हमने भी उसे ही स्वीकृत किया है। इसलिये
इस संस्करणके बालकाण्डकी पदसंख्या ११० है और समस्त पद
३३० हैं।
प्रस्तुत पुस्तकके पाठ-संशोधन और अनुवादमें उपर्युक्त सब
प्रतियोंसे सहायता ली गयी है तथा इनके सिवा पूज्यपाद श्रीजय-
रामदासजी दीन (रामायणी) और श्रद्धेय गोस्वामी श्रीचिम्मन-
लालजी एम्० ए० शास्त्रीने भी इस अनुवादकी आद्योपान्त आवृत्ति
करके मूल पाठ और अनुवादमें जहाँ-तहाँ संशोधन करनेकी कृपा
की है। इसके लिये मैं उपर्युक्त सभी महानुभावोंका अत्यन्त कृतज्ञ
हूँ। आशा है, इन सबकी इस प्रसादीके द्वारा पाठकोंका कुछ
मनोरञ्जन हो सकेगा।
विनीत :-
मुनिलाल

श्रीहरिः
विषय-सूची
विषय पृष्ठ
बालकाण्ड
१-बधाई .... १७
२-नामकरण .... ३४
३-दुलार .... ३९
४-विश्वामित्रजीका आगमन. .... ६१
५-अहल्योद्धार .... १०२
६-जनकपुर-प्रवेश .... १०५
७-पुष्पवाटिकामें .... १२०
८-रंगभूमिमें .... १२३
९-विवाहकी तैयारी .... १५९
१०-अयोध्या आगमन ... १७२
अयोध्याकाण्ड
११-राज्याभिषेककी तैयारी १७४
१२-वनके लिये विदाई .... १७५
१३-वनके मार्गमें .... १८४
१४-चित्रकूट-वर्णन .... २१७
१५-कौसल्याकी विरह-वेदना .... २३३
१६-महाराजदशरथका देह-त्याग २३७
१७-भरतजी अयोध्यामें .... २४१
१८-भरतजीका चित्रकूटको
प्रस्थान .... २४४
विषय पृष्ठ
१९-राम-भरत-सम्मेलन .... २४६
२०-रामविधुरा अयोध्या .... २५८
अरण्यकाण्ड
२१-भगवान्‌का वन-विहार .... २६७
२२-मारीच-वध .... २६८
२३-सीता-हरण .... २७३
२४-जटायु-वध .... २७४
२५-रामकी वियोगव्यथा .... २७५
२६-जटायुसे भेंट .... २७६
२७-शबरीसे भेंट .... २८३
किष्किन्धाकाण्ड
२८-ऋष्यमूकपर राम .... २८६
२९-सीताजीकी खोजका आदेश २६०
सुन्दरकाण्ड
३०-अशोकवनमें हनूमान् .... २९१
३१-हनुमान् और रावणकी
भेंट .... ३०५
३२-सीताजीसे विदाई .... ३०८
३३-हनूमान्‌जीका भगवान्
रामके पास पहुँचना .... ३१०
३४-वानरसेनाकी लंकायात्रा .... ३१७

[ ६ ]
विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ
| उत्तरकाण्ड
३५-रावणकी मन्त्रणा .... ३१६ | ४५-रामराज्य .... ३८१
३६-विभीषण-शरणागति .... ३२३ | ४६-रामरूप-वर्णन .... ३८२
३७-जानकी-त्रिजटा-संवाद .... ३४६ | ४७-रामहिंडोला ४१३
लंकाकाण्ड | ४८-अयोध्याका रमणीयता .... ४१५
३८-मन्दोदरी-प्रबोध .... ३५२ | ४६-दीपमालिका .... ४२०
३६-अंगदका दूतकर्म .... ३५४ | ५०-वसन्त-विहार .... ४२१
४०-लक्ष्मण-मूर्च्छा .... ३५८ | ५१-अयोध्याका आनन्द .... ४२७
४१-विजयी राम .... ३७० | ५२-रामराज्य .... ४२८
४२-अयोध्यामें प्रतीक्षा .... ३७१ | ५३-सीता वनवास .... ४२६
४३-अयोध्यामें आनन्द .... ३७५ | ५४-लव-कुश-जन्म .... ४३८
४४-राज्याभिषेक .... ३७७ | ५५-रामचरितका उल्लेख .... ४४२
SRI RAMAKRISHNA ASHRAMA
LIBRARY, SRINAGAR.
Accession No - 3737...
Date ... 23-8-1985

श्रीहरिः
वर्णानुक्रमणिका

पद-सूचनापृष्ठ-संख्यापद-सूचनापृष्ठ-संख्या
अमिय-बिलोकनि करि कृपा....४७आजु बन्यो है बिपिन२२६
अवध आजु आगमी एकु आयो५०आजुको भोर, और सो, माई२३३
अनुकूल नृपहि सूलपानि हैं१३०आरते बचन कहति बंदेही२७३
अवध बिलोकि हौं जीवत२३६आश्रम निरखि भूले२७७
अवसि हौं आयसु पाइ रहौंगो२५६आये देखि दूत सुनि ...३१६
अतिहि अधिक दरसनकी आरति३१४अपनी अपनी भांति ....३२१
अति भोग बिभीषनके भले ....३४०आइ सचिव बिभीषनके कही३२६
अबहीं मैं तोसों न कहे री ....३४८आली, अब राम-लषन कितह्वैं हैं३७२
अवधि आजुकिधौं ओरौदिनह्वै हैं३७१आजु अवध आनंद बधावन३७६
अवध नगर अति सुंदर ....४२१आजु रघुबीर छबि३६१
आंगन फिरत घुटुरुवनि धाये६४आजु रघुपति-मुख ....३६६
आंगन खेलत आनंदकंद७१आली री ! राघोके ....४१३
आजु सुदिन सुभ घरी सुहाई१७आइ लषन लैं सौंपी सिय ....४३२
आजु महामंगल कोसलपुर ....२५ऋषि संग हरषि चले दोउ भाई६५
आजु अनरसेहैं भोरके, पय ....४५ऋषिराज ! राजा आजु१४२
आजु सकल सुकृत फलु पाइहौं६२ऋषि-नृप सीस ठगोरी सी डारी१६०
आये सुनि कौसिकजनकहरषाने हैं१०५ऋतु-पति आए भलो ....२३०
आली ! काहू तो बूझो न ....२११ए कौन कहांते आए ? ....११०
आली री ! पथिक जे एहि ..२१३एई राम-लषन जे मुनि-सँग१२५
आली! हौं इन्हहि बुझावौं कैसे२६३ऐसे तैं क्यों कटु बचन ....२४१
आइ रहे जबतें दोउ भाई ....२२२कनक-रतनमय पालनो रच्यो५५

[ ११ ]
पद-सूचना | पृष्ठ-संख्या | पद-सूचना | पृष्ठ-संख्या
कहौ तुम्ह बिनु गृह .... १८० | कृपानिधान सुजान प्रानपति १७६
कहौ सो विपिन हैं .... १८४ | खेलन चलिये आनंदकंद .... ८३
करतराउ मनुमो अनुमान .... २४० | खेलि खेल सुखेलनिहारे .... ८६
कहै सुक सुनहि सिखावन सारो २४७ | खेलत बसंत राजाधिराज .... ४२५
कर-सर-धनु कटि रुचिर निषंग २७० | गये राम सग्न सेबको भलो ३४०
कहु कपि ! कब रघुनाथ .... ३०२ | गावें विबुध विमलबर बानी २७
कवहूँ, कपि राघव आवर्हिगे ? ३०३ | गीने मौनही बारहिबार .... ४३५
कपिके चलत सियको .... ३०६ | घर-घर अवध बधावने .... ३०
कपिके सुनि कल कोमल बैन ३१६ | चहत महामुनि जाग जयो ६१
करुनाकरकी करुना भई ३३५ | चले लेन लषन हनुमान हैं ... ३३३
कहो, क्यों न बिभीषतकी बनै? ३३६ | चरचा चरनिसों चरची .... ४३१
कब देखौंगी नयन .... ३४६ | चारय्यो भले बेटा .. १०३
कहु, कबहुं देखिहौं .... ३४७ | चित्रकूट अति बिचित्र .... २१७
काहेको खोरि कैकयिहि लावौं? २४३ | चुपिरि उबटि अन्हवाइकै ... ४२
काहेको मानत हानि हिये हौ ? २५५ | छंगन-मंगन-अंगना खेलत ६६
काहूसों काहू समाचार ऐसे पाए २६५ | छेमकरी ! बलि, बोलि सुबानी ३७४
कुंवर सांवरो री सजनी ! १८८ | छोटी-छोटी गोड़ियां, अंगुरियाँ ७४
कैसे पितु मातु .. १६७ | छोटिएँ धनुहियां, पनहियां .... ८७
कैकयी करी धौं चतुराई कौन? २६१ | जनकबिलोकिबारबार रघुवरको १२७
कैकेयी जौलौं जियति रही .... ४४१ | जब तें राम-लषन चितए, री १२८
कोसलरायके कुंअंरोटा .... १०७ | जबहि सब नृपति निरास भए १४७
कोसलपुरी सुहावनी .... ४१५ | जब दोउ दशरथ कुंवर बिलोके १४६
कीसिकके मखके रखवारे .... १०४ | जनक मुदित मन टूटत .... १५३
कैसिक कृपालहूको .... १११ | जयमाल जानकी जलजकर .... १५५
कौतुक ही कपि .... ३६४ | जब तें लै मुनि संग सिधाए ... १६१