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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 454 में से

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पृष्ठ 99

६३ बालकाण्ड
[ महाराज दशरथ कहते हैं ] हे मुनिवर ! आज आपके
चरणकमल देखकर मैं जहाँतक साधुसमाज है वहाँतक गिनतीमें सबसे
आगे हो गया हूँ ॥ १ ॥ फिर चरणवन्दना कर, हाथ जोड़, निहोरा
कर कहने लगे—'मुनिवर ! कृपा करके अपना कार्य बतलाइये; एक
रामको छोड़कर और देह, गेह तथा सम्पूर्ण राज्यादिमेंसे कोई भी
वस्तु ऐसी नहीं है जिसे मैं न दे सकूँ' ॥ २ ॥ [विश्वामित्रजी बोले—]
राजन् ! तुमने बहुत ठीक कहा । त्रिलोकीमें तुम्हारे सिवा और कौन
पुण्यवानोंमें शिरोमणि है ? क्योंकि सम्पूर्ण सुकर्मोंका साज तो
भगवान् रामके जन्मसे ही जाना जा रहा है । [ तात्पर्य, जब आप
सुकृतसींव हैं तभी तो साक्षात् परब्रह्म परमात्माने आपके यहाँ जन्म
लिया है ] ॥ ३ ॥
[ ५० ]
राजन ! राम-लषन जो दीजै ।
जस रावरो, लाभ ढोटनिहूँ, मुनि सनाथ सब कीजै ॥ १ ॥
डरपत हौ साँचे सनेह-बस सुत-प्रभाव बिनु जाने ।
बूझिय बामदेव अरु कुलगुरु, तुम पुनि परम सयाने ॥ २ ॥
रिपु रन दलि, मख राखि कुसल अति अलप दिननि घर ऐहैं ।
तुलसिदास रघुबंसतिलककी कबिकुल कीरति गैहैं ॥ ३ ॥
हे राजन् ! यदि आप राम और लक्ष्मण कों दे दें तो आपका
तो यश हो और बालकोंका बड़ा लाभ हो । अतःआप सब मुनियोंको
सनाथ कर दीजिये ॥ १ ॥ तुम अपने पुत्रोंका प्रभाव न जाननेसे
जो स्नेहवश डरते हो वह ठीक ही है, किन्तु इनके विषयमें तुम
वामदेवजी और अपने कुलगुरु वसिष्ठजीसे तो पूछो । इसके सिवा