गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१ बालकाण्ड
विश्वामित्रजीका आगमन
राग सारङ्ग
[ ४७ ]
चहत महामुनि जाग जयो ।
नीच निसाचर देत दुसह दुख, कृस तनु ताप तयो ॥ १ ॥
सापे पाप, नये निदरत खल, तब यह मंत्र ठयो ।
बिप्र-साधु-सुर-धेनु-धरनि-हित हरि अवतार लयो ॥ २ ॥
सुमिरत श्रीसारंगपानि छनमें सब सोच गयो ।
चले मुदित कौसिक कोसलपुर, सगुननि साथ दयो ॥ ३ ॥
करत मनोरथ जात पुलकि, प्रगटत आनंद नयो ।
तुलसी प्रभु-अनुराग उमगि मग मंगल-मूल भयो ॥ ४ ॥
महामुनि विश्वामित्रजी यज्ञ पूर्ण करना चाहते हैं, परन्तु नीच
निशाचरगण दुःसह दुःख देते हैं । अतः उस चिन्तासे सन्तप्त रहनेके
कारण उनका शरीर सूख गया है ॥ १ ॥ वे यदि शाप देते हैं तो
उन्हे पाप लगता है और यदि झुकते हैं तो दुष्ट निशाचरादि उनका
तिरस्कार करते हैं । अतः उन्होंने यह विचार किया—'ब्राह्मण,
साधु, देवता, गौ और पृथ्वीके हितके लिये इस समय श्रीहरिने
अवतार लिया है' ॥ २ ॥ इस प्रकार श्रीशार्ङ्गपाणिकी याद आते ही
क्षणभरमें उनका सारा शोक दूर हो गया । अतः मुनिवर कौशिक प्रसन्न
चित्तसे अयोध्यापुरीको चल दिये । इन समय शकुनोंने भी उनका
साथ दिया ॥ ३ ॥ वे मार्गमें तरह-तरहके मनोरथ करते जाते थे; उस
समय उनके शरीरमें पुलकावली हो आनेसे नया-नया आनन्द प्रकट
होता था । तुलसीदास कहते हैं—प्रभु-प्रेमके अनुरागकी उमङ्गमें
उन्हें वह मार्ग बड़ा मङ्गलमय हो गया ॥ ४ ॥