गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८५ बालकाण्ड
छवि निहारकर नगरके नर-नारी अपने नेत्रोंका फल पाते हैं।
तुलसीदासके हृदयमें अयोध्यापति महाराज दशरथके चारों बालक
विराजते हैं ॥ ३ ॥
[ ४२ ]
जैसे राम ललित तैसे लोने लषन लालु ।
तैसेई भरत सील-सुषमा-सनेह-निधि, तैसेई सुभग सँग
सत्रुसालु ॥ १ ॥
धरे धनु-सर कर, कसे कटि तरकसी, पीरे पट ओढ़े चले
चारु चालु ।
अंग अंग भूषन जरायके जगमगत, हरत जनके जीको
तिमिरजालु ॥ २ ॥
खेलत चौहट घाट बीथी बाटकनि प्रभु सिव सुप्रेम-मानस-
मरालु ।
सोभा-दान दै दै सनमानत जाचकजन करत लोक-लोचन
निहालु ॥ ३ ॥
रावन-दुरित-दुख दलैं सुर कहैं आजु 'अवध सकल सुखको
सुकालु ।'
तुलसी सराहें सिद्ध सुकृत कौसल्याजूके, भूरि-भाग-भाजन
भुवालु ॥ ४ ॥
जैसे सुन्दर भगवान् राम हैं वैसे ही मनोहर लषनलाल भी हैं तथा
वैसे ही शील, सुषमा और स्नेहके भण्डार श्रीभरतजी हैं और उनके
साथ वैसे ही सुन्दर श्रीशत्रुघ्नजी भी हैं ॥ १ ॥ चारों भाई हाथमें
धनुष-बाण लिये, कमरमें तरकस कसे तथा पीताम्बर ओढ़े अति
मनोहर चाल चलते हैं । उनके अङ्ग-अङ्गमें जड़ाऊ आभूषण
जगमगाते हैं, जो भक्तोंके हृदयका अन्धकार समूह हर लेते हैं ॥२॥