गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ८०
वचनावलि सुन भगवान् रामने अपने कमल-नयन खोले।
तुलसीदासजी कहते हैं—जिस समय स्वभावसे ही सुन्दर भगवान्
रामने आँगनमें पाँव रखे उस समय माता प्रसन्नचित्तसे आरती
करने लगी ॥ ५ ॥
[ ३८ ]
जागिये कृपानिधान जानराय रामचन्द्र
जननी कहै बार-बार भोर भयो प्यारे ।
राजिवलोचन बिसाल, प्रीति-बापिका मराल,
ललित कमल-बदन ऊपर मदन कोटि वारे ॥ १ ॥
अरुन उदित, बिगत सरबरी, ससांक किरनहीन,
दीन दीपजोति, मलिन, दुति समूह तारे ।
मनहुँ ग्यानघन-प्रकास, बीते सब भव-बिलास
आस-त्रास तिमिर तोष-तरनि-तेज जारे ॥ २ ॥
बोलत खगनिकर मुखर मधुर करि प्रतीत सुनहु
श्रवन, प्रानजीवन धन, मेरे तुम बारे ।
मनहुँ बेद-बन्दी-मुनिबृन्द-सूत-मागधादि
बिरुद बदत 'जय जय जय जयति कैटभारे' ॥ ३ ॥
बिकसित कमलावली, चले प्रपुंज चञ्चरीक,
गुंजत कल कोमल धुनि त्यागि कंज न्यारे ।
जनु बिराग पाइ सकल सोक-कूप गृह बिहाइ
भृत्य प्रेममत्त फिरत गुनत गुन तिहारे ॥ ४ ॥
सुनत बचन प्रिय रसाल जागे अतिसय दयाल
भागे जंजाल बिपुल, दुख-कदंब दारे ।
तुलसिदास अति अनन्द पेखिकै मुखारबिंद,
छूटे भ्रमफंद परम मंद द्वंद भारे ॥ ५ ॥