गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ७८
अनुज सखा सब बोलनि आये । बंदिन्ह अति पुनीत गुन गाये ॥ ४ ॥
मनभावतो कलेऊ कींजै । तुलसिदास कहँ जूठनि दीजै ॥ ५ ॥
[माता कहती है—] हे रघुनन्दन ! सबेरा हो गया, अब उठ
बैठो । तुम कपटरहित भक्तोंके हृदयके चन्दन (शीतलता प्रदान करने-
वाले) हो ॥ १ ॥ चन्द्रमाकी किरणें फीकी पड़ गयीं और तारे तेजहीन हो
गये। हे मेरे प्यारे ! सुनो, कुक्कुट (मुर्ग) बोलने लगे ॥ २ ॥ कमल खिल
गये, कुमुदगण मुरझा गये तथा भ्रमरवृन्द पराग एवं रस (मकरन्द)
लेकर उड़ गये ॥ ३ ॥ देखो, तुम्हारे सब अनुज और मित्रगण बुलाने
आये हैं तथा बन्दीजन अति पवित्र गुणगाथा गा रहे हैं ॥ ४ ॥ अब
तुम मनभाता कलेऊ करो और तुलसीदासको अपनी जूठन दो ॥ ५ ॥
[ ३७ ]
प्रात भयो तात, बलि मातु बिधु-बदनपर
मदन वारौं कोटि, उठौ प्रानप्यारे !
सूत-मागध-बंदि बदत बिरुदावली,
द्वार सिसु अनुज प्रियतम तिहारे ॥ १ ॥
कोक गतसोक अवलोकि ससि छीनछबि,
अरुनमय गगन राजत रुचि तारे।
मनहुँ रबि बाल मृगराज तमनिकर-करि
दलित, अति ललित मनिगन बिथारे ॥ २ ॥
सुनहु तमचुर मुखर, कीर कलहंस पिक
केकि रव कलित, बोलत बिहँग बारे।
मनहुँ मुनिबृन्द रघुबंसमनि ! रावरे
गुनत गुन आश्रमनि सपरिवारे ॥ ३ ॥