गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१ बालकाण्ड
राग बिलावल
[ ३१ ]
आँगन खेलत आनँदकंद। रघुकुल-कुमुद-सुखद चारुचंद ॥ १ ॥
सानुज भरत लषन संग सोहैं। सिसु-भूषन भूषित मन मोहैं।
तन-दुति मोरचंदजिनि झलकें। मनहु उमगि अँग-अँग छबि छलकें ॥ २ ॥
कटि किंकिनि पग पँजनि बाजैं। पंकज पानि पहुँचीआँ राजैं।
कठुला कंठ बघनहा नीके। नयन-सरोज-मयन-सरसीके ॥ ३ ॥
लटकन लसत ललाट लटूरीं। दमकति द्वै द्वै दँतुरियाँ रूरीं ॥
मुनि-मन हरत मंजु मसि बुंदा। ललित बदन बलि बालमुकुंदा ॥ ४ ॥
कुलही चित्र बिचित्र झँगूलीं। निरखत मातु मुदित मन फूलीं ॥
गहि मनिखंभ डिंभ डगि डोलत। कलबल बचन तोतरे बोलत ॥ ५ ॥
किलकत, झुकि झाँकत प्रतिबिंबनि। देत परम सुख पितु अरु अँबनि ॥
सुमिरत सुखमा हिय हुलसी है। गावत प्रेम-पुलकि तुलसी है ॥ ६ ॥
रघुकुलरूप कुमुदको आनन्दित करनेवाले मनोहर मयंक
आनन्दकन्द भगवान् राम आँगनमें खेल रहे हैं ॥ १ ॥ शत्रुघ्नसहित
भरत और लक्ष्मणजी सङ्गमें सुशोभित हैं; चारों भाई बालोचित
आभूषणोंसे भूषित हैं और मनको मोहे लेते हैं। शरीरकी कान्ति
ऐसी है मानों मयूरपिच्छकी चन्द्रिकाएँ झलक रही हों तथा अङ्ग-
अङ्गसे छवि मानों उमँग-उमँगकर छलकी पड़ती हो ॥ २ ॥ कमरमें
करधनीकी और चरणोंमें नूपुरकी ध्वनि हो रही है, करकमलमें
पहुँचियाँ शोभा दे रही हैं। कण्ठमें कठुला तथा व्याघ्रनख सुन्दर
मालूम होते हैं तथा नयनकमल मानों कामसरोवरसे उत्पन्न हुए हैं
॥ ३ ॥ माथेपर छोटी-छोटी अलकें तथा [ सुवर्णमय ] लटकन