गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७ बालकाण्ड
हो ॥ ५ ॥ उस समय महाराज दशरथकी गृह-लक्ष्मी कौसल्याजी
अपने लालको देखकर अपने पुण्यफलका अनुभव कर रही थीं।
तुलसीदासके हृदयमें भी प्रभुका वह किलकना और आनन्ददायक
लड़खड़ाना बसा रहता है ॥ ३ ॥
[ २८ ]
नेकु बिलोकि धौं रघुबरनि ।
चारु फल त्रिपुरारि तोको दिये कर नृप-घरनि ॥ १ ॥
बाल भूषन बसन, तन सुन्दर रुचिर रजभरनि ।
परसपर खेलनि अजिर, उठि चलनि, गिरि गिरि परनि ॥ २ ॥
झुकनि, झाँकनि, छाँह सों किलकनि, नटनि, हठि लरनि ।
तोतरी बोलनि, बिलोकनि, मोहनी मनहरनि ॥ ३ ॥
सखि-बचन सुनि कौसिला लखि सुढर पासे ढरनि ।
लेति भरि भरि अंक सँतति पैंत जनु दुहु करनि ॥ ४ ॥
चरित निरखत बिबुध तुलसी ओट दै जलधरनि ।
चहत सुर सुरपति भयो सुरपति भये चहै तरनि ॥ ५ ॥
[ किसी समय माता कोसल्याको अन्यमनस्का देखकर कोई
सखी कहती है—] अरी राजरानी ! तू तनिक इन रघुवीरोंकी ओर
देख तो सही। श्रीशङ्करने तेरे हाथमें चारों फल प्रदान किये हैं ॥ १॥
तू इनके बालोचित वस्त्र और आभूषण, सुन्दर शरीरकी दर्शनीय
धूलि-धूसरता, आँगनमें आपसका खेल-कूद, उठ-उठकर चलना और
फिर गिर-गिर पड़ना, झुकना, झाँकना, परछाई देखकर किलकना,
नाचना, हठ करके लड़ना, तोतली बोली बोलना तथा मनको हरने-
वाली मोहिनी चितवन तो देख ॥ २-३ ॥ सखीके ये वचन सुनकर
कौसल्याजीने समझ लिया कि मेरे अच्छे पाँसे पड़े हैं ( मैं भाग्यवती