गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३ बालकाण्ड
रूप - वृक्षमें फैलकर मानों रात्रि अपनी छबि छिटका रही है ॥३॥
हे तात ! अब तुम्हें जमुहाई आ रही है और तुम अलसा रहे हो ।
मैं तुम्हारी आदत अच्छी तरह जान गयी हूँ । अच्छा, मैं गा-गाकर
और हिला डुलाकर सुखमयी निद्राको बुलाती हूँ' ॥४॥ फिर
सुमित्रा मैया मग्नमनसे पुचकार-पुचकारकर 'मेरे बछरा ! मेरे
छबीले छौना !' आदि कहने लगीं । तुलसीदासजी कहते हैं—
उस समयका भाइयोंके सहित प्रभुका वह ललित बालभाव मेरे
हृदयमें उमंगें मारता है ॥५॥
[ २० ]
ललन लोने लेरुआ, बलि मैया ।
सुख सोइए नींद-बेरिया भई, चारु-चरित चारौ भैया ॥ १ ॥
कहति मल्हाई, लाइ उर छिन-छिन, ‘छगन छबीले छोटे छैया ।
मोद-कंद कुल-कुमुद-चंद्र मेरे रामचंद्र रघुरैया' ॥ २ ॥
रघुबर बालकेलि संतनकी सुभग सुभद सुरगैया ।
तुलसी दुहि पीवत सुख जीवत पय सप्रेम घनी घैया ॥ ३ ॥
हे ललन ! हे लोने वत्स ! माता बलि जाती है । लाल ! अब
नींदका समय हो गया है; अतः मनोहर चरितवाले चारों भाई !
सुखपूर्वक सो जाओ ॥१॥ बालकोंको छातीसे चिपटाकर माता
पुचकार-पुचकारकर कहती है, 'हे मेरे छोटे छबीले छौना, हे मेरे
आनन्दकन्द, हे कुलरूप कुमुदवनके लिये चन्द्रमा, हे मेरे रघुकुल-
भूषण राम !' आदि ॥२॥ रघुनाथजीकी बाललीला सन्तजनोंके लिये
अति सुन्दर और शुभप्रद कामधेनु ही है । तुलसीदास उसका
प्रेमरूप दूध दुहते हुए उसकी घैया (थनसे निकलती हुई दूधकी