गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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मातु सकल, कुलगुर-वधू, प्रिय सखी सुहाई।
सादर सब मंगल किए महि-मनि-महेस पर
सबनि सुधेनु दुहाई ॥ १ ॥
बलि भूप भूसुर लिये अति बिनय बड़ाई।
पूजि पायँ, सनमानि, दान दिये, लहि असीस, सुनि
बरषैं सुमन सुरसाईं ॥ २ ॥
घर-घर पुर बाजन लगीं आनंद-बधाई।
सुख-सनेह तेहि समयको तुलसी जानै जाको चोरचो
है चित चहुँ भाई ॥ ३ ॥
कौसल्या आदि माताएँ, कुलगुरुपत्नी अरुन्धती और प्रिय
सखियोंने आदरपूर्वक सब मङ्गलकृत्य किये और पृथ्वीके अलङ्काररूप
भगवान् शङ्करपर दूध चढ़ानेके लिये सुन्दर गौओंका दोहन
कराया ॥ १ ॥ फिर महाराजने अत्यन्त विनय और सम्मानपूर्वक
ब्राह्मणोंको बुलाया और उनके पाँव पूज सम्मानित कर तरह-तरहके
दान दिये तथा उनसे आशीर्वाद पाया, जिसे सुनकर येवराज इन्द्र
पुष्पवर्षा करने लगे ॥ २ ॥ नगरमें घर-घर आनन्दकी बधाइयाँ
बजने लगीं। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समयका सुख और
स्नेह वही जान सकता है, जिसका चित्त चारों भाइयोंने चुरा
लिया है ॥ ३ ॥
राग धनाश्री
[ १६ ]
या सिसुके गुन-नाम-बड़ाई।
को कहि सकै, सुनहु नरपति, श्रीपति समान प्रभुताई ॥ १ ॥